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जगन्नाथ रथ यात्रा: आस्था के साथ सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता का संदेश

डॉ. धनंजय गिरि

विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ रथ यात्रा इस वर्ष 16 जुलाई से आरंभ होकर 24 जुलाई तक चलेगी, जबकि रथोत्सव का समापन 27 जुलाई को होगा। ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली यह ऐतिहासिक यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरण संरक्षण, पारिवारिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकात्मता का जीवंत प्रतीक मानी जाती है। हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन तथा रथ खींचने के लिए पुरी पहुंचते हैं।

आस्था और परंपरा का महापर्व

पुरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर भारत के चार प्रमुख धामों में से एक है। मान्यता है कि इसकी स्थापना प्राचीन काल में हुई थी तथा आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठों में से गोवर्धन मठ भी यहीं स्थित है। मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की काष्ठ प्रतिमाएं विराजमान हैं।

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को तीनों देव विग्रह अपने-अपने रथों पर सवार होकर लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं। कुछ दिनों के प्रवास के बाद वे पुनः मुख्य मंदिर लौटते हैं।

भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ 16 पहियों वाला लगभग 44 फीट ऊंचा होता है। बलभद्र का तालध्वज रथ 14 पहियों वाला और सुभद्रा का दर्पदलन रथ 42 फीट ऊंचा होता है। लाखों श्रद्धालु इन रथों को मोटी रस्सियों से खींचते हैं और इसे पुण्य का कार्य माना जाता है।

पर्यावरण संरक्षण और लोककला का संदेश

जगन्नाथ रथ यात्रा की एक बड़ी विशेषता इसका पर्यावरण के प्रति सम्मान है। रथ निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया से आरंभ होता है। प्रतिवर्ष नए रथ बनाए जाते हैं, लेकिन इनके निर्माण में आधुनिक मशीनों का उपयोग नहीं किया जाता। स्थानीय शिल्पकार पारंपरिक तकनीकों से रथ तैयार करते हैं।

रथों के निर्माण में धातु के बजाय मुख्य रूप से लकड़ी का उपयोग किया जाता है। परंपरा के अनुसार ऐसी लकड़ी का उपयोग किया जाता है, जो प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हो या पहले से संरक्षित की गई हो। इस पूरी प्रक्रिया में स्थानीय कारीगरों और लोक कलाकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जिससे भारतीय लोक शिल्प और सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण होता है।

सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण

रथ यात्रा का शुभारंभ एक विशेष परंपरा से होता है। पुरी के गजपति महाराज स्वयं स्वर्ण झाड़ू से रथों के आगे सफाई करते हैं। इस अनुष्ठान में राजपुरोहित और सबर जनजाति के प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं। यह परंपरा इस संदेश को मजबूत करती है कि भगवान के समक्ष सभी समान हैं और समाज में ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

मंदिर की सेवा व्यवस्था में भी विभिन्न समुदायों और परंपराओं के लोगों की सहभागिता दिखाई देती है, जो भारतीय समाज की समावेशी संस्कृति का परिचायक है।

पौराणिक मान्यता

पौराणिक कथाओं के अनुसार सबर जनजाति के प्रमुख विश्ववसु भगवान नीलमाधव के परम भक्त थे। बाद में राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में भगवान ने मंदिर निर्माण का निर्देश दिया। समुद्र से प्राप्त पवित्र लकड़ी से भगवान की प्रतिमाओं का निर्माण हुआ। मान्यता है कि स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने इन प्रतिमाओं को आकार दिया था।

रथ यात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ 15 दिनों तक अनासार काल में रहते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में वे अस्वस्थ होते हैं और उपचार के बाद ही भक्तों को दर्शन देते हुए यात्रा पर निकलते हैं।

परिवार और राष्ट्रीय एकात्मता का संदेश

जगन्नाथ मंदिर भारतीय संस्कृति के पारिवारिक मूल्यों का भी प्रतीक है। यहां भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं, जो परिवार में प्रेम, सम्मान और समन्वय का संदेश देता है।

साथ ही यह मंदिर भारत की सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण का संबंध मथुरा और द्वारका से, सुभद्रा का संबंध हस्तिनापुर से तथा पुरी का पूर्वी भारत से जुड़ना पूरे देश की सांस्कृतिक एकात्मता को दर्शाता है। यही कारण है कि जगन्नाथ रथ यात्रा को भारत की सांस्कृतिक एकता का महापर्व कहा जाता है।

संघर्ष, आक्रमण और पुनर्निर्माण का इतिहास

श्री जगन्नाथ मंदिर का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही संघर्षपूर्ण भी रहा है। इतिहास में इस मंदिर पर अनेक बार विदेशी आक्रमण हुए। 14वीं शताब्दी में बंगाल के सुल्तान इलियास शाह के हमले से लेकर फिरोजशाह तुगलक, अलाउद्दीन हुसैन शाह के सेनापति इस्माइल गाजी, अफगान आक्रमणकारी काला पहाड़ तथा मुगल शासन के विभिन्न सेनापतियों द्वारा मंदिर को कई बार निशाना बनाया गया।

इन आक्रमणों के दौरान मंदिर को क्षति पहुंचाई गई, लूटपाट हुई और कई बार भगवान की प्रतिमाओं को सुरक्षित रखने के लिए पुजारियों ने उन्हें छिपा दिया। बाद में श्रद्धालुओं, स्थानीय शासकों और समाज के सहयोग से मंदिर का पुनर्निर्माण होता रहा।

मुगल शासन के पतन और मराठा शक्ति के उदय के बाद मंदिर के पुनरुद्धार का कार्य तेज हुआ। बाद के वर्षों में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर सहित अनेक श्रद्धालुओं और शासकों के प्रयासों से मंदिर को पुनः भव्य स्वरूप प्राप्त हुआ।

भारतीय संस्कृति की जीवंत विरासत

जगन्नाथ रथ यात्रा आज केवल ओडिशा का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक चेतना का महापर्व बन चुकी है। यह यात्रा आस्था, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, लोककला, पारिवारिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकात्मता का ऐसा संगम है, जो भारत की सनातन सांस्कृतिक परंपरा को विश्वभर में नई पहचान देता है। लाखों श्रद्धालुओं की सहभागिता यह सिद्ध करती है कि जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक एकता का विराट उत्सव है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक व संघ से जुड़े हैं। )

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