Thursday, April 16, 2026
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पत्नी द्वारा परिवार की सेवा पर क्या बोला हाई कोर्ट?

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पति या ससुराल पक्ष द्वारा पत्नी से परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल में सहयोग करने के लिए कहना अपने आप में क्रूरता नहीं माना जा सकता।जस्टिस नीना बंसल की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक महिला की शिकायत के आधार पर दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी कानूनी कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

यह मामला उस शिकायत से जुड़ा था, जिसमें महिला ने अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ धारा 498A IPC, धारा 406 IPC और घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत आरोप लगाए थे।सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि महिला के अधिकांश आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे। कोर्ट के अनुसार, शिकायत में ऐसे ठोस तथ्य नहीं थे जिनसे यह साबित हो सके कि वास्तव में उसके साथ क्रूरता या कोई आपराधिक कृत्य हुआ है।

अदालत ने यह भी कहा कि प्रस्तुत आरोप पति-पत्नी के बीच आम घरेलू विवाद और मतभेद की श्रेणी में आते हैं, न कि आपराधिक अपराध की।महिला ने यह भी आरोप लगाया था कि उसकी अविवाहित ननद पति के आर्थिक मामलों और संपत्ति से जुड़े निर्णयों को नियंत्रित करती है। इस पर अदालत ने कहा कि यदि परिवार में ऐसा चलन हो या किसी कारण से बहन अपने भाई के वित्तीय मामलों में भूमिका निभाती है, तो इसे असामान्य या अवैध नहीं माना जा सकता।

साथ ही, शिकायत में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इससे महिला को वास्तविक रूप से क्या नुकसान हुआ।दहेज को लेकर लगाए गए आरोपों पर भी कोर्ट ने कहा कि इनमें किसी विशेष घटना या स्पष्ट विवरण का अभाव है। इसी तरह, सास के कुछ महीनों तक बहू के साथ रहने को भी अदालत ने क्रूरता नहीं माना।

इसके अलावा, देवर के बच्चे की देखभाल में सहयोग करने के कथित दबाव के मुद्दे पर भी अदालत ने कहा कि परिवार के सदस्य की देखभाल में मदद करने के लिए कहना अपने आप में क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता।अदालत ने यह भी पाया कि धारा 406 IPC के तहत लगाए गए आरोपों में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि स्त्रीधन किसे सौंपा गया था या उसका दुरुपयोग कैसे हुआ।इन सभी तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मामला आपराधिक मुकदमे के योग्य नहीं है। इसलिए पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज एफआईआर तथा संबंधित कानूनी कार्यवाही को रद्द कर दिया गया।

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