नीतीश कुमार के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद बिहार की राजनीति में एक दिलचस्प संवैधानिक स्थिति बन गई है। उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता छोड़ दी है, लेकिन मुख्यमंत्री पद पर बने हुए हैं।संविधान के अनुसार, कोई भी व्यक्ति एक साथ संसद और राज्य विधानमंडल दोनों का सदस्य नहीं रह सकता। इसी वजह से उन्हें विधान परिषद से इस्तीफा देना पड़ा।
हालांकि, मुख्यमंत्री पद छोड़ना उनके लिए अभी जरूरी नहीं है।भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत, अगर कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री है लेकिन राज्य के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो उसे 6 महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना होता है। ऐसा नहीं करने पर उसे पद छोड़ना पड़ता है।इसका मतलब है कि नीतीश कुमार के पास अभी 6 महीने का समय है, जिसमें वे मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं।
मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के बावजूद उनके कुछ अधिकार सीमित हो जाते हैं:वे विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं, इसलिए1. किसी भी बिल, प्रस्ताव या बजट पर वोट नहीं दे सकते2. सदन की कार्यवाही में हिस्सा ले सकते हैं, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में मतदान का अधिकार नहीं होगाहाँ, कोई व्यक्ति एक साथ मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद रह सकता है। संविधान में इसे लेकर कोई रोक नहीं है। लेकिन शर्त यही है कि 6 महीने के अंदर उसे राज्य के किसी सदन का सदस्य बनना होगा।आगे क्या हो सकता है?
राजनीतिक तौर पर यह तय माना जा रहा है कि आने वाले समय में बिहार को नया मुख्यमंत्री मिल सकता है। हालांकि नाम को लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है।Samrat Choudhary का नाम चर्चा में जरूर है, लेकिन पार्टी के भीतर अभी सहमति बनती नजर नहीं आ रही। ऐसे में अंतिम फैसला आने में समय लग सकता है।फिलहाल, संवैधानिक प्रावधानों के चलते नीतीश कुमार के पास 6 महीने का समय है। इस दौरान वे मुख्यमंत्री बने रहेंगे, लेकिन सीमित अधिकारों के साथ। आने वाले महीनों में ही तय होगा कि बिहार की कमान किसके हाथ में जाएगी।

