बच्चों में तेजी से बढ़ रही स्क्रीन की लत को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने एक नई ड्राफ्ट नीति तैयार की है। इसका मकसद छात्रों को डिजिटल उपकरणों का संतुलित और जिम्मेदार उपयोग सिखाना है। इस नीति को स्वास्थ्य विभाग, राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण और NIMHANS जैसे संस्थानों ने मिलकर तैयार किया है।यह नीति खासतौर पर 9वीं से 12वीं कक्षा के छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।
इसमें तीन स्तरों पर काम करने की योजना है—सरकारी दिशा-निर्देश, शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण और अभिभावकों के साथ बेहतर संवाद।ड्राफ्ट के अनुसार, स्कूलों को पढ़ाई के साथ-साथ “डिजिटल वेलनेस” को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा। इसके तहत छात्रों को ऑनलाइन सुरक्षा, प्राइवेसी, साइबर बुलिंग और सीमित स्क्रीन उपयोग जैसी चीजों के बारे में सिखाया जाएगा।
नीति की एक अहम सिफारिश यह है कि पढ़ाई के अलावा मनोरंजन के लिए स्क्रीन टाइम को रोजाना एक घंटे तक सीमित रखा जाए। इसके अलावा, हर स्कूल में एक “डिजिटल वेलनेस कमेटी” बनाने का सुझाव दिया गया है, जिसमें शिक्षक, काउंसलर, अभिभावक और साइबर क्राइम से जुड़े अधिकारी शामिल होंगे।इसमें यह भी कहा गया है कि ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल के संकेत—जैसे व्यवहार में बदलाव, अकेलापन या पढ़ाई में गिरावट—को समय रहते पहचानना जरूरी है।
इसके लिए शिक्षकों को खास ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि वे ऐसे मामलों में छात्रों को सही मार्गदर्शन और काउंसलिंग दिला सकें।छात्रों को स्क्रीन से दूर रखने के लिए स्कूलों में आउटडोर गतिविधियां, हॉबी क्लब और “नो टेक्नोलॉजी डे” जैसे कार्यक्रम शुरू करने की भी सिफारिश की गई है। साथ ही, स्कूलों को सलाह दी गई है कि वे बच्चों से बातचीत के लिए मोबाइल ऐप्स के बजाय डायरी जैसे पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करें।इस नीति में अभिभावकों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण मानी गई है।
उन्हें घर में “डिवाइस-फ्री टाइम” तय करने, बच्चों के साथ खुलकर बात करने और खुद भी संतुलित डिजिटल आदतें अपनाने की सलाह दी गई है। कुल मिलाकर, यह पहल बच्चों की बढ़ती डिजिटल निर्भरता को कम करने और उन्हें एक स्वस्थ व संतुलित जीवनशैली की ओर ले जाने का प्रयास है।

