देश के कई हिस्सों, खासकर दिल्ली में एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता और कीमतों को लेकर चिंता बढ़ती नजर आ रही है। चुनावी माहौल के बीच महंगाई पर नियंत्रण के दावों के साथ-साथ यह आशंका भी जताई जा रही है कि चुनाव खत्म होने के बाद गैस की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।
इस मुद्दे पर कीर्ति आजाद ने सवाल उठाते हुए कहा कि एलपीजी की कीमतों और आपूर्ति से जुड़ी समस्याएं पहले भी चुनावों के बाद देखने को मिली हैं। उनका आरोप है कि चुनाव खत्म होते ही गैस के दामों में 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की जाती रही है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर स्थिति सामान्य है, तो फिर लोगों को गैस सिलेंडर के लिए लंबी कतारों में क्यों खड़ा होना पड़ रहा है और अतिरिक्त पैसे क्यों देने पड़ रहे हैं।हालांकि सरकार की ओर से किसी बड़े संकट या सप्लाई में रुकावट की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
इसके बावजूद आम लोगों के बीच यह चिंता बनी हुई है कि आने वाले समय में कीमतों में बदलाव हो सकता है।विशेषज्ञों का मानना है कि एलपीजी, पेट्रोल और डीजल की कीमतें कई अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कारकों पर निर्भर करती हैं। इसमें कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति और सब्सिडी से जुड़ी नीतियां शामिल हैं। इसलिए कीमतों में उतार-चढ़ाव पूरी तरह बाजार और नीतिगत फैसलों पर निर्भर करता है।सरकार ने पश्चिम एशिया के हालात को भी एक अहम कारण बताया है।
खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली आपूर्ति पर दबाव बढ़ने की बात कही गई है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से प्राप्त करता है।इस बीच नरेंद्र मोदी ने संसद में आश्वासन दिया कि देश में ऊर्जा संकट की स्थिति नहीं आने दी जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की सप्लाई को बनाए रखने के लिए लगातार काम कर रही है और आम नागरिकों को राहत देना उसकी प्राथमिकता है।
प्रधानमंत्री के अनुसार, भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने ऊर्जा आयात स्रोतों को बढ़ाया है और अब कई देशों से तेल और गैस खरीदी जाती है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हुई है। इसके अलावा देश के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी मौजूद हैं और भविष्य के लिए भंडारण क्षमता बढ़ाने पर काम किया जा रहा है।फिलहाल, एलपीजी की उपलब्धता और कीमतों को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच लोगों की नजर सरकार के अगले कदम पर टिकी है। यह देखना अहम होगा कि चुनाव के बाद वाकई कीमतों में बढ़ोतरी होती है या यह केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहता है।

