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‘द इंडिया स्टोरी’ फिल्म में कीटनाशकों संबंधी भ्रामक एवं अप्रमाणित दावों की सीबीएफसी से जांच कराने की एसीएफआई ने की मांग

नई दिल्ली: एग्रोकेमिकल उत्पादों एवं इस उद्योग के संबंध में किए गए भ्रामक और निराधार आरोपों, भारतीय किसानों को कलंकित करने तथा देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लागू नियामकीय एवं विधायी व्यवस्थाओं को कमजोर करने के प्रयासों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसीएफआई) ने आगामी फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी: स्लो पॉइज़न इन प्रोग्रेस’ के प्रदर्शन का विरोध किया है। एसीएफआई ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के अध्यक्ष श्री शशि शेखर वेम्पति को एक कड़े शब्दों में पत्र लिखकर फिल्म में किए गए दावों की गहन जांच करने तथा 24 जुलाई, 2026 को प्रस्तावित सार्वजनिक प्रदर्शन से पूर्व आवश्यक कार्रवाई करने की मांग की है।

एसीएफआई के महानिदेशक डॉ. कल्याण गोस्वामी ने कहा, “फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी: स्लो पॉइज़न इन प्रोग्रेस’ का ट्रेलर भारत की कृषि और खाद्य प्रणाली को भय एवं सनसनी फैलाने वाले अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। इसमें आधुनिक कृषि पद्धतियों को अनेक सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक समस्याओं का प्रत्यक्ष कारण बताया गया है, जबकि इसके समर्थन में कोई स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाण नहीं दिया गया है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि फिल्म की कथा न केवल वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है, बल्कि यह भारत की कृषि की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ किसानों की आजीविका और देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी खतरा उत्पन्न करती है।”

भारत के लगभग 85 प्रतिशत एग्रोकेमिकल उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाले शीर्ष उद्योग संगठन एसीएफआई ने मांग की है कि फिल्म के प्रमाणन और सार्वजनिक प्रदर्शन से पहले किसी भी भ्रामक, अतिरंजित, अप्रमाणित अथवा तथ्यहीन सामग्री की उचित समीक्षा कर आवश्यक संशोधन किए जाएं।

ट्रेलर में प्रमुखता से किए गए दावों पर संगठन ने कहा, “इन दावों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जबकि इनके समर्थन में किसी स्रोत, कार्यप्रणाली, भौगोलिक संदर्भ या वैज्ञानिक आधार का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इसके विपरीत, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित संस्थाओं के उपलब्ध प्रमाण बिल्कुल अलग तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।”

इन दावों का खंडन करते हुए संगठन ने कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला दिया। एसीएफआई ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 40,094 मीट्रिक टन कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है।

संगठन ने कहा, “इन उत्पादों का उपयोग स्वीकृत कृषि पद्धतियों के अनुरूप खेतों में किया जाता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि देश की जनता ‘50,000 से अधिक मीट्रिक टन कीटनाशकों का उपभोग’ कर रही है। इसके अतिरिक्त भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अंतर्गत सरकार समर्थित अध्ययनों से पता चलता है कि जांचे गए 96.5 प्रतिशत से अधिक कृषि उत्पाद निर्धारित कीटनाशक अवशेष सीमा के अनुरूप पाए गए हैं और उपभोग के लिए सुरक्षित हैं।”

संगठन ने यह भी कहा कि “ट्रेलर में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को सीधे कृषि उत्पादों से जोड़ने का प्रयास विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा निर्धारित कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों के वैज्ञानिक आकलन से मेल नहीं खाता।”

एसीएफआई ने ट्रेलर में कीटनाशकों से होने वाली मौतों के आंकड़ों को जिस प्रकार प्रस्तुत किया गया है, उसकी भी आलोचना करते हुए कहा कि इससे मौतों के वास्तविक कारणों और परिस्थितियों को लेकर भ्रामक धारणा बनती है।

संगठन ने कहा, “राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया 2024’ रिपोर्ट के अनुसार कीटनाशकों अथवा कीटनाशी दवाओं के आकस्मिक सेवन से 7,821 मौतें दर्ज की गईं।”

एसीएफआई ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ट्रेलर कैंसर और मृत्यु जैसी जटिल सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्याओं को एग्रोकेमिकल्स से बढ़ा-चढ़ाकर जोड़ने का प्रयास करता है। संगठन ने कहा, “बिना संदर्भ, स्रोत या वैज्ञानिक प्रमाण के बड़े-बड़े आंकड़ों को प्रस्तुत करना जनता को गुमराह कर सकता है और भारत की खाद्य प्रणाली की सुरक्षा को लेकर अनावश्यक भय पैदा कर सकता है।”

भारतीय किसानों को कलंकित किए जाने पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए संगठन ने कहा कि भारतीय खाद्य पदार्थों को व्यापक रूप से ‘स्लो पॉइज़न’ बताना न केवल देश में उपभोक्ताओं का विश्वास कमजोर करता है, बल्कि इसके गंभीर अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी पड़ सकते हैं।

संगठन ने कहा, “ऐसे दावों का उपयोग विदेशी नियामक संस्थाएं, प्रतिस्पर्धी निर्यातक, विभिन्न हित समूह अथवा व्यापारिक संगठन भारतीय कृषि उत्पादों की सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लगाने तथा भारत के कृषि निर्यात को प्रभावित करने के लिए कर सकते हैं।”

एसीएफआई ने यह भी कहा कि ट्रेलर यह भ्रामक संदेश देता है कि भारत सरकार के पास खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए न तो प्रभावी नियंत्रण है, न मजबूत विधायी एवं नियामकीय व्यवस्था और न ही जनस्वास्थ्य के प्रति पर्याप्त संवेदनशीलता। जबकि वास्तविकता यह है कि देश में अनेक सक्षम सरकारी नियामक संस्थाएं कार्यरत हैं, जो 140 करोड़ से अधिक लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ करोड़ों किसानों की आजीविका का भी संरक्षण करती हैं।
संगठन ने कहा, “हमारी नियामक संस्थाओं को उदासीन या खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में पूरी तरह अक्षम बताने का प्रयास करते हुए फिल्म अप्रमाणित और तथ्यहीन आंकड़ों के आधार पर संदेश देती है।”

एसीएफआई ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग जिम्मेदारी की भावना के साथ किया जाना चाहिए, विशेष रूप से तब जब विषय सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका और राष्ट्रीय हितों से जुड़ा हो। संगठन का मानना है कि इस प्रकार का निराधार चित्रण भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा, उसकी प्रमुख नियामक संस्थाओं की विश्वसनीयता तथा भारतीय खाद्य एवं कृषि क्षेत्र की आर्थिक सुदृढ़ता को दीर्घकालिक और गंभीर क्षति पहुंचा सकता है।

एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया (ACFI) के बारे में
एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया (ACFI) देश के लगभग 85 प्रतिशत एग्रोकेमिकल उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रमुख उद्योग संगठन है। संगठन सुरक्षित एवं विवेकपूर्ण तरीके से एग्रोकेमिकल्स के उपयोग को बढ़ावा देने तथा किसानों के हित में टिकाऊ फसल संरक्षण उत्पादों एवं नई प्रौद्योगिकियों के विकास और प्रसार के लिए प्रतिबद्ध है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एसीएफआई विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों, किसान संगठनों तथा सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर कार्य करता है। संगठन किसानों को फसल सुरक्षा रसायनों (कीटनाशकों) के सही उपयोग, उचित मात्रा, समय पर छिड़काव, वैज्ञानिक अनुप्रयोग पद्धति तथा व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) के उपयोग के बारे में जागरूक कर अधिक उत्पादन एवं बेहतर गुणवत्ता वाली कृषि उपज प्राप्त करने में सहयोग प्रदान करता है।

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