राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में सन्मार्ग माइंड वेलनेस सेंटर के लोकार्पण समारोह में बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जो चिंता व्यक्त की, वह केवल एक सामाजिक टिप्पणी नहीं, बल्कि आज के परिवारों के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती की ओर संकेत है। उनका यह संदेश कि बच्चों को मोबाइल थमाने के बजाय उनके साथ संवाद बढ़ाया जाए, वर्तमान समय की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता को रेखांकित करता है।
तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ ही पारिवारिक संवाद का दायरा भी सिमटता गया है। आज अनेक घरों में जब कोई बच्चा रोता है या जिद करता है, तो उसे शांत कराने के लिए उसके हाथ में मोबाइल फोन दे दिया जाता है। यह उपाय तत्काल समस्या का समाधान भले ही प्रतीत हो, लेकिन धीरे-धीरे बच्चों को वास्तविक संवाद और भावनात्मक जुड़ाव से दूर कर देता है। इसका प्रभाव उनके मानसिक विकास और सामाजिक व्यवहार पर भी पड़ता है।
मोहन भागवत ने कहा कि पहले संयुक्त परिवारों में दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों को कहानियाँ सुनाते थे। इन कहानियों के माध्यम से बच्चों में नैतिक मूल्यों, धैर्य, आत्मविश्वास और जीवन की कठिनाइयों का सामना करने का साहस विकसित होता था। आज संयुक्त परिवारों के विघटन और व्यस्त जीवनशैली के कारण यह परंपरा लगभग समाप्त होती जा रही है। परिणामस्वरूप बच्चों के जीवन में संवाद का स्थान धीरे-धीरे डिजिटल माध्यमों ने ले लिया है।
उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि आज कई बच्चे छोटी-छोटी असफलताओं या पारिवारिक डांट-फटकार को सहन नहीं कर पाते। परीक्षा में असफल होने या मानसिक दबाव के कारण आत्महत्या जैसी घटनाएँ समाज के लिए गंभीर चेतावनी हैं। यह स्थिति केवल शिक्षा व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि परिवार, समाज और सामाजिक परिवेश से भी जुड़ा विषय है।
संघ प्रमुख ने मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि स्वस्थ मन के बिना स्वस्थ जीवन की कल्पना अधूरी है। उनका कहना था कि मनुष्य के अनुभव उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। सकारात्मक अनुभव आत्मविश्वास और संतुलन पैदा करते हैं, जबकि नकारात्मक अनुभव मन को कमजोर बना सकते हैं। इसलिए बचपन से ही ऐसा वातावरण तैयार करना आवश्यक है, जहाँ बच्चों को अपनापन, संवाद और भावनात्मक सुरक्षा मिले।
उन्होंने यह भी कहा कि मनोविज्ञान का आधुनिक स्वरूप भले ही पश्चिम में विकसित हुआ हो, लेकिन भारत में मन और चेतना के अध्ययन की समृद्ध परंपरा रही है। भारतीय चिंतन ने सदैव मन, आत्मसंयम और मानसिक संतुलन को जीवन के विकास का आधार माना है।
नागपुर में स्थापित सन्मार्ग माइंड वेलनेस सेंटर की सराहना करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे विशेषज्ञ समाज की बड़ी आवश्यकता को पूरा कर रहे हैं। उनका मानना था कि यदि यह सेवा केवल पेशा न होकर सामाजिक दायित्व की भावना से की जाए, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक और सकारात्मक होता है।
आज जब बच्चों का बड़ा हिस्सा डिजिटल दुनिया में अधिक समय व्यतीत कर रहा है, तब परिवारों के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन्हें समय देना, उनकी बातें सुनना और उनके साथ विश्वासपूर्ण संवाद स्थापित करना है। मोबाइल कुछ समय के लिए बच्चे को शांत कर सकता है, लेकिन उसके व्यक्तित्व का निर्माण केवल परिवार का स्नेह, संवाद और संस्कार ही कर सकते हैं। स्वस्थ, आत्मविश्वासी और संवेदनशील पीढ़ी के निर्माण के लिए यह संदेश आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।

