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ब्रह्मांड के शुरुआती दौर की सबसे बड़ी खोज, भारतीय वैज्ञानिक ने खोजा ‘आकाशगंगाओं का शहर’

जब पृथ्वी का अस्तित्व भी नहीं था, तब ब्रह्मांड कैसा दिखता था? इस रहस्य को समझने की दिशा में भारत के युवा खगोलशास्त्री डॉ. रोनाल्डो लाइशराम ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम के साथ मिलकर ब्रह्मांड की एक बेहद प्राचीन और विशाल संरचना की खोज की है, जिसे “लोकतक प्रोक्लस्टर” नाम दिया गया है।

यह संरचना पृथ्वी से लगभग 12.6 अरब प्रकाश वर्ष दूर मौजूद है। यानी वैज्ञानिकों को यह उस समय की तस्वीर दिखा रही है, जब ब्रह्मांड की उम्र केवल 1.2 अरब वर्ष थी। वैज्ञानिकों के अनुसार यह आकाशगंगाओं का ऐसा समूह है, जो भविष्य में एक विशाल “गैलेक्सी क्लस्टर” का रूप ले सकता है।

“प्रोक्लस्टर” वह अवस्था होती है, जब कई आकाशगंगाएं गुरुत्वाकर्षण के कारण एक-दूसरे के करीब आने लगती हैं और धीरे-धीरे एक विशाल समूह का निर्माण करती हैं। इसे वैज्ञानिक “आकाशगंगाओं का शहर” भी कहते हैं।

“लोकतक प्रोक्लस्टर” में चार घने आकाशगंगा समूह एक विशाल कॉस्मिक संरचना के भीतर जुड़े हुए पाए गए हैं। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि आज ब्रह्मांड में मौजूद बड़े-बड़े “गैलेक्सी क्लस्टर”आखिर कैसे बने।

इस खोज में दो आधुनिक दूरबीनों की अहम भूमिका रही— जापान की राष्ट्रीयखगोलीय वैधशाला (JWST) और सुबारू टेलीस्कोप, पहले सुबारू टेलीस्कोप ने इस संरचना का पता लगाया, जिसके बाद JWST की मदद से इसका विस्तृत अध्ययन किया गया।

JWST के अवलोकन से यह भी सामने आया कि घनी आबादी वाले क्षेत्रों की आकाशगंगाएं अधिक फैली हुई हैं। इसका मतलब यह है कि ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में भी आसपास का वातावरण आकाशगंगाओं के विकास को प्रभावित कर रहा था।

डॉ. रोनाल्डो लाइशराम मणिपुर के थौबल जिले के रहने वाले हैं और फिलहाल जापान के National Astronomical Observatory of Japan में रिसर्च कर रहे हैं।

उन्होंने इस संरचना का नाम मणिपुर की प्रसिद्ध लोकतक झील के नाम पर रखा। यह झील अपने तैरते हुए द्वीपों यानी फुमदियों के लिए जानी जाती है। वैज्ञानिकों को आकाशगंगाओं का यह समूह उन्हीं तैरते द्वीपों जैसा दिखाई दिया, इसलिए इसका नाम “लोकतक प्रोक्लस्टर” रखा गया।

भारत के लिए गर्व का पल

यह खोज सिर्फ विज्ञान की दुनिया में ही नहीं, बल्कि भारत के लिए भी गर्व की बात है। इससे डार्क मैटर, आकाशगंगाओं की उत्पत्ति और ब्रह्मांड के शुरुआती विकास को समझने में नयी दिशा मिलेगी। आने वाले वर्षों में इस संरचना पर और गहराई से अध्ययन किया जाएगा।

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