कृष्णमोहन झा
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विगत दिनों नागपुर के लक्ष्मी नगर स्थित साइंटिफिक सोसाइटी सभागार में यूट्यूब वीडियो “डा हेडगेवार: आधुनिक युग के शालिवाहन” के सार्वजनिक प्रसारण के अवसर पर आयोजित एक गरिमामय कार्यक्रम में संघ के वर्तमान स्वरूप और समाज में उसकी बढ़ती हुई स्वीकार्यता और सम्मान को रेखांकित करते हुए कहा कि संघ को अपने शुरुआती वर्षों में जिस उपेक्षा और विरोध का सामना का करना पड़ता था वह स्थिति अब कहीं नहीं है। अपने कार्यों को आगे बढाने के लिए संघ के सामने अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हैं।
मोहन भागवत ने कहा कि संघ की स्वीकार्यता और सम्मान निरंतर बढ़ रहा है ,संघ के बारे में अच्छी बातें सुनाई पडने लगी हैं परंतु उनमें रमना नहीं है बल्कि हमें अपने लक्ष्य की ओर सतत बढते रहना है। संघ प्रमुख ने अपनी बात को आगे बढाते हुए कहा कि संघ का आकर्षण अब विदेशों तक पहुँच चुका है और अब तो विदेशों से आने वाले लोग भी संघ के कार्यों को देखकर हमसे यह पूछने लगे हैं कि क्या आप हमें भी ऐसा प्रशिक्षण दे सकते हैं जिसके माध्यम से हम अपने देश के युवाओं को प्रशिक्षित कर सकें। संघ प्रमुख ने कहा कि संघ का कार्य केवल सक्रिय कार्य कर्ता तैयार करना नहीं है बल्कि संघ ऐसे समर्पित स्वयंसेवक तैयार करता है जो जीवन भर संघ के संस्कारों के अनुरूप आचरण करते हुए समाज सेवा के कार्यों में जुटा रहता है।संघ प्रमुख ने कहा कि संघ का स्वयंसेवक प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों परअडिग रहकर समाज के लिए कार्य करता रहता है।मोहन भागवत ने कहा कि संघ और उसके स्वयंसेवकों की सर्वोच्च प्राथमिकता ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना है जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा करने में सक्षम हों।
संघ प्रमुख ने अपने संबोधन की शुरुआत में कहा कि संघ के शताब्दी वर्ष में हम लोगों को ऐसे बहुत से अवसर प्राप्त हुए जिनमें हमने संघ के कार्यकर्ताओं का स्मरण किया और संघ के कार्य का चिंतन किया।ऐसे अवसर देने वाले वाले बहुत से कार्य क्रम हुए जिनमें स्वयंसेवकों के साथ ही नागरिकों की भी सहभागिता रही परंतु आज का यह कार्यक्रम की विशेषता यह है मानो कोई वृक्ष का सुंदर पुष्प अथवा पर्ण या फल अपनी जड़ों का स्मरण कर रहा हो। जब तीसरी, चौथी और पाचवीं पीढ़ी के कार्यकर्ता पहली पीढ़ी के कार्यकर्ताओं का स्मरण करते हैं तो उससे उनके द्वारा शुरू किया गया कार्य आगे बढता है।नयी पीढ़ी को प्रेरणा मिलती है। संघ प्रमुख ने कहा कि कार्य आगे बढ़ता है तो प्रतिष्ठा बढती है, समाज में विश्वास का वातावरण बनता है। प्रारंभिक काल में जो उपेक्षा थी वह समाप्त हो जाती है। कार्य करने के लिए साधन उपलब्ध हो जाते हैं और जयजयकार होने लगती है।
संघ प्रमुख ने कहा कि कार्य बढने के साथ उसका स्वरूप बदलता है लेकिन मूल नहीं बदलना चाहिए। भागवत ने कहा कि केवल सक्रिय कार्यकर्ता होना पर्याप्त नहीं है। सक्रियता तो दूसरा गुण है। पहला गुण है संघ का जीवन जीना। जहां संघ का जीवन है वहां संघ मौजूद है। संघ के स्वयंसेवकों के जीवन की साधना पूर्णता की साधना है। इसकी कोई मर्यादा नहीं है। इसका कोई छोर नहीं है। संघ के स्वयंसेवकों को यह साधना विपरीत परिस्थितियों में भी भी जीवन भर करना होता है।
संघ प्रमुख ने कहा कि सारी दुनिया यह जानती है कि भारत ही सारी दुनिया को रास्ता दिखाएगा परंतु जो रास्ता दुनिया को दिखाने की हमारे ऊपर जिम्मेदारी है उस रास्ते पर पहले हमें खुद चलना पडेगा। भारत को दुनिया में जो करना है वैसा करने के लिए पहले हमें खुद को समर्थ बनाना होगा। दुनिया के सामने उदाहरण बनना पडेगा फिर भारत केउदाहरण से दुनिया उस मार्ग पर चलने के लिए प्रशस्त होगी।
संघ प्रमुख ने कहा कि अक्सर यह कहा जाता है कि जिन संगठनों से संघ के स्वयंसेवक जुड़े हुए हैं उन्हें संघ केंद्र से अथवा रिमोट से नियंत्रित करता है। संघ प्रमुख ने इस धारणा का खंडन करते हुए कहा कि लोग ऐसा मानते हैं परंतु यह वास्तविकता नहीं है।संघ कार्य की रचना ऐसी नहीं है।वे संगठन अपना कार्य करने के लिए स्वतंत्र हैं।
संघ प्रमुख ने संघ के 100 पूर्ण कालिक प्रचारकों के जीवन पर आधारित वीडियो निर्माण के काम की सराहना करते हुए कहा कि शताब्दी वर्ष में ऐसे व्यक्तित्वों का स्मरण करना व स्मरण कराने के लिए आज की तकनीक में बहुत कम समय में अधिक लोगों तक जानकारी पहुंचाने वाले माध्यमों का उपयोग करके उसका प्रवर्तन करना महत्वपूर्ण आवश्यक कार्य है।

(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)

