अनुच्छेद 44 की भावना, समान अधिकारों की बहस और मध्यप्रदेश की नई पहल पर एक नजर
भारत का संविधान केवल शासन व्यवस्था का आधार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी मार्गदर्शक दस्तावेज है। संविधान निर्माताओं ने ऐसे भारत की परिकल्पना की थी, जहां नागरिकों के अधिकार उनके धर्म, जाति या पंथ के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी समान नागरिकता के आधार पर सुनिश्चित हों। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य से नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड-यूसीसी) लागू करने का प्रयास करने की अपेक्षा की गई थी।
स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद यह विषय एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। उत्तराखंड के बाद अब मध्यप्रदेश सरकार ने भी समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक को मंत्रिमंडल से मंजूरी देकर विधानसभा में पेश करने का निर्णय लिया है। इससे यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या अब संविधान का यह अधूरा संकल्प साकार होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
संविधान सभा से शुरू हुई थी बहस
समान नागरिक संहिता का विचार नया नहीं है। संविधान सभा में इस पर विस्तृत चर्चा हुई थी। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर का मानना था कि आधुनिक लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों का आधार समानता होना चाहिए। वहीं के.एम. मुंशी और अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर जैसे सदस्यों ने भी विवाह, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में समान कानूनी व्यवस्था का समर्थन किया था।
हालांकि उस समय देश की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए इसे मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं किया गया, बल्कि नीति-निर्देशक तत्वों में स्थान दिया गया, ताकि भविष्य में सामाजिक सहमति बनने पर इसे लागू किया जा सके।
न्यायपालिका भी समय-समय पर करती रही है टिप्पणी
पिछले सात दशकों में समान नागरिक संहिता का विषय न्यायपालिका, विधि आयोग, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के बीच लगातार चर्चा का विषय रहा है। शाह बानो मामला और सरला मुद्गल प्रकरण जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर विचार करने की बात कही। न्यायालय का उद्देश्य किसी धर्म विशेष पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि संविधान में निहित समानता के सिद्धांत की ओर ध्यान आकर्षित करना था।
मध्यप्रदेश की पहल क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तराखंड के बाद मध्यप्रदेश इस दिशा में आगे बढ़ने वाला दूसरा राज्य बनने की तैयारी में है। राज्य सरकार ने इस विषय पर एक समिति का गठन किया, व्यापक स्तर पर जनसुझाव आमंत्रित किए और प्राप्त सुझावों के आधार पर विधेयक का मसौदा तैयार किया। सरकार का दावा है कि लाखों लोगों से प्राप्त सुझावों और व्यापक परामर्श के बाद यह प्रारूप तैयार किया गया है।
प्रस्तावित विधेयक में क्या-क्या प्रावधान?
प्रस्तावित समान नागरिक संहिता में कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं—
- बहुविवाह पर रोक।
- विवाह का अनिवार्य पंजीकरण।
- तलाक की एक समान कानूनी प्रक्रिया।
- महिलाओं और पुरुषों को उत्तराधिकार में समान अधिकार।
- कुछ परिस्थितियों में लिव-इन संबंधों का पंजीकरण।
- अनुसूचित जनजातियों को फिलहाल कानून के दायरे से बाहर रखने का प्रस्ताव।
सरकार का कहना है कि इन प्रावधानों का उद्देश्य सभी नागरिकों को समान कानूनी अधिकार प्रदान करना है। वहीं कुछ विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि ऐसे व्यापक बदलावों के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों पर निरंतर संवाद आवश्यक है।
क्या केवल कानून से आएगा सामाजिक परिवर्तन?
इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या केवल कानून बना देने से समाज में समानता स्थापित हो जाएगी?
भारत का अनुभव बताता है कि सामाजिक परिवर्तन केवल कानूनों से नहीं आते। बाल विवाह निषेध, दहेज निषेध, घरेलू हिंसा से संरक्षण और शिक्षा का अधिकार जैसे कानूनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन इनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए समाज की सोच में बदलाव भी उतना ही जरूरी रहा। समान नागरिक संहिता के साथ भी यही चुनौती जुड़ी हुई है।
यदि यह कानून महिलाओं को अधिक सुरक्षा प्रदान करता है, विवाह और उत्तराधिकार में समान अधिकार सुनिश्चित करता है तथा न्यायिक प्रक्रियाओं को सरल बनाता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकता है। लेकिन इसकी सफलता केवल कानूनी प्रावधानों पर नहीं, बल्कि समाज में विश्वास, संवाद और व्यापक स्वीकार्यता पर भी निर्भर करेगी।
अन्य राज्यों के लिए भी बनेगा अध्ययन का विषय
मध्यप्रदेश की यह पहल केवल राज्य तक सीमित नहीं रहेगी। अन्य राज्य भी इसके अनुभवों का अध्ययन करेंगे। यदि यह मॉडल प्रभावी और न्यायसंगत सिद्ध होता है तो देशव्यापी नीति निर्माण को नई दिशा मिल सकती है। वहीं यदि व्यावहारिक चुनौतियां सामने आती हैं तो उनसे सीख लेकर भविष्य की नीतियों को और बेहतर बनाया जा सकेगा।
संविधान की भावना और सामाजिक समरसता का प्रश्न
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। भाषा, संस्कृति, परंपरा और आस्था की इस विविधता को सुरक्षित रखते हुए सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करना आसान कार्य नहीं है। यही कारण है कि समान नागरिक संहिता पर चर्चा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक, सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी की जानी चाहिए।
लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन संवाद और सहमति की प्रक्रिया ही किसी बड़े सामाजिक परिवर्तन को स्थायी बनाती है।
समान नागरिक संहिता का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होगा कि क्या यह संविधान की मूल भावना—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—को और अधिक मजबूत करती है। यदि यह कानून समान नागरिक अधिकारों के साथ समाज में विश्वास और समरसता का वातावरण भी निर्मित करता है, तो मध्यप्रदेश की यह पहल भारतीय लोकतंत्र के विकासक्रम में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है।
संविधान केवल अधिकारों का दस्तावेज नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा भी निर्धारित करता है। समान नागरिक संहिता उसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। अब यह समय और उसका क्रियान्वयन तय करेगा कि यह पहल भारत को कितना अधिक न्यायपूर्ण, समतामूलक और सामाजिक रूप से समरस बना पाती है।

