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20 सांसदों की बगावत से हिली TMC की नींव, क्या ममता बनर्जी बचा पाएंगी अपनी पार्टी

तृणमूल कांग्रेस (TMC) में चल रहा आंतरिक संकट अब पश्चिम बंगाल विधानसभा से निकलकर संसद तक पहुंच गया है। सोमवार को पार्टी की वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया कि करीब 20 टीएमसी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भेजकर एनडीए का समर्थन करने की इच्छा जताई है। यदि यह दावा औपचारिक रूप से मान्य हो जाता है, तो यह ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा संगठनात्मक झटका साबित हो सकता है।

काकोली घोष दस्तीदार के अनुसार, 20 सांसदों ने एनडीए के साथ राजनीतिक रूप से जुड़ने का फैसला किया है और इसके लिए लोकसभा स्पीकर को पत्र भी भेजा गया है। बागी खेमे का तर्क है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी की दिशा बदलने की जरूरत है।

संसद में टीएमसी के 28 लोकसभा सांसद हैं। ऐसे में 20 सांसदों का अलग होना दो-तिहाई के आंकड़े को पार करता है, जो दल-बदल कानून के अंतर्गत किसी गुट को अलग पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण माना जाता है। यह संकट सिर्फ सांसदों की संख्या का नहीं, बल्कि नेतृत्व की वैधता का है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पहले ही पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ रहा था। अब यदि लोकसभा में भी बड़ा धड़ा अलग हो जाता है तो ममता बनर्जी की संगठन पर पकड़ कमजोर होने का संदेश जाएगा।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह स्थिति महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में हुए विभाजन जैसी चुनौती पैदा कर सकती है, जहां मूल नेतृत्व को पार्टी और चुनाव चिन्ह दोनों पर कानूनी-राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ी थी। भाजपा के लिए यह घटनाक्रम कई स्तरों पर लाभकारी हो सकता है। लोकसभा में एनडीए की संख्या और मजबूत होगी। पश्चिम बंगाल में भाजपा को टीएमसी के भीतर से अनुभवी चेहरे मिल सकते हैं। 2029 की राष्ट्रीय राजनीति और बंगाल की भविष्य की राजनीति में भाजपा की स्थिति और मजबूत हो सकती है। विपक्ष के सबसे बड़े क्षेत्रीय दलों में से एक के कमजोर होने से राष्ट्रीय विपक्ष की सामूहिक ताकत घट सकती है। टीएमसी कांग्रेस के बाद विपक्ष की सबसे प्रभावशाली पार्टियों में गिनी जाती रही है। ऐसे समय में जब दिल्ली में विपक्षी दल साझा रणनीति बनाने की कोशिश कर रहे हैं, उसी दौरान टीएमसी में यह टूट विपक्षी एकता की कहानी को कमजोर कर सकती है

अब सबसे अहम नजरें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर रहेंगी। यदि बागी सांसद औपचारिक रूप से अलग संसदीय समूह की मान्यता मांगते हैं, तो स्पीकर के समक्ष संख्या बल और दल-बदल कानून से जुड़े प्रश्न आएंगे। दूसरी ओर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की कोशिश होगी कि और सांसद टूटकर न जाएं तथा पार्टी का संगठनात्मक ढांचा बचाया जा सके।पश्चिम बंगाल विधानसभा में बगावत के बाद अब संसद में भी टीएमसी के भीतर विद्रोह खुलकर सामने आ गया है। 20 सांसदों के एनडीए के समर्थन के दावे ने ममता बनर्जी की राजनीतिक चुनौती को कई गुना बढ़ा दिया है।

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