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टीवी और ओटीटी के बीच घटते फर्क के बीच स्टार प्लस का ‘ये फितूर तेरा’ बिल्कुल सही जगह पर

मुंबई। मनोरंजन की दुनिया में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म एक दिन टेलीविजन की जगह ले लेंगे। लेकिन बदलती दर्शक आदतों ने इस सवाल को ही कुछ हद तक अप्रासंगिक बना दिया है। आज दर्शक टीवी और ओटीटी को दो अलग-अलग दुनिया की तरह नहीं देखते, बल्कि दोनों को एक ही व्यापक व्यूइंग इकोसिस्टम का हिस्सा मानते हैं। सुविधा, पसंद और समय के हिसाब से वही दर्शक कभी टीवी स्क्रीन के सामने होता है तो कभी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर अपनी पसंद का कंटेंट देखता है।

इसी बदलते दौर में स्टार प्लस का नया शो ‘ये फितूर तेरा’ बिल्कुल सही जगह पर दिखाई देता है। शो की कहानी एक तरफ टेलीविजन फिक्शन की उस भावनात्मक ताकत से जुड़ती है, जिसने वर्षों से दर्शकों को किरदारों और रिश्तों से जोड़े रखा है, वहीं दूसरी तरफ इसकी युवा कहानी, कॉलेज का माहौल और आज के रिश्तों की बदलती समझ इसे नई पीढ़ी के दर्शकों के करीब ले जाती है।

कहानी के केंद्र में सौम्या और जीत हैं, जिनका रिश्ता आज के समय की प्रेम कहानी को सामने रखता है। इसमें प्यार, भावनाएं, उलझनें और रिश्तों की गर्माहट है—वे तत्व, जो पारंपरिक टेलीविजन दर्शकों के लिए हमेशा आकर्षण का केंद्र रहे हैं। लेकिन कहानी का ट्रीटमेंट, युवा किरदार और समकालीन परिवेश इसे उस दर्शक वर्ग से भी जोड़ते हैं, जो लंबे समय से ओटीटी की तेज और सुविधाजनक व्यूइंग शैली का हिस्सा बन चुका है।

यही इस शो की सबसे दिलचस्प खासियत है। कोई दर्शक सौम्या और जीत की कहानी को अपनी रोजमर्रा की टीवी रूटीन का हिस्सा बनाकर देख सकता है, जबकि दूसरा दर्शक उसी कहानी को अपनी सुविधा और अपने समय के अनुसार जियोहॉटस्टार पर देख सकता है। कंटेंट वही है, लेकिन उसे देखने का तरीका अलग हो सकता है।

दरअसल, आज ‘टीवी ऑडियंस’ और ‘ओटीटी ऑडियंस’ को पूरी तरह अलग-अलग वर्गों में बांटना मुश्किल होता जा रहा है। एक ही व्यक्ति सुबह मोबाइल पर स्ट्रीमिंग कंटेंट देख सकता है, शाम को टीवी पर कोई शो देख सकता है और सप्ताहांत में फिर किसी ओटीटी सीरीज के साथ समय बिता सकता है। प्लेटफॉर्म बदलते हैं, लेकिन दर्शक वही रहता है।

‘ये फितूर तेरा’ इसी बदलाव को समझने वाला शो नजर आता है। इसकी इमोशनल स्टोरीटेलिंग टेलीविजन की उस खूबी को बरकरार रखती है, जहां किरदारों और रिश्तों को धीरे-धीरे विकसित होने का पर्याप्त समय मिलता है। वहीं, इसके युवा प्रोटागोनिस्ट, कॉलेज सेटिंग, संगीत और आज के रिश्तों की जटिलताओं का चित्रण इसे नई पीढ़ी के लिए प्रासंगिक बनाता है।

यह बदलाव केवल देखने के माध्यम तक सीमित नहीं है, बल्कि कहानी कहने के तरीके को भी प्रभावित कर रहा है। अब असली सवाल यह नहीं रह गया है कि कोई कहानी टीवी के लिए बनी है या ओटीटी के लिए। असली सवाल यह है कि क्या वह कहानी दर्शकों के दिल तक पहुंच सकती है?

यही वजह है कि आने वाला दौर शायद ‘टीवी बनाम ओटीटी’ का नहीं, बल्कि ‘स्टोरी फर्स्ट’ का दौर होगा। जो कहानियां मजबूत किरदारों, भावनाओं और दर्शकों से जुड़ने की क्षमता रखती हैं, वे अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर अपनी जगह बना सकती हैं।

‘ये फितूर तेरा’ इसी बदलते मनोरंजन परिदृश्य का उदाहरण है—एक ऐसी कहानी, जो टेलीविजन की भावनात्मक पकड़ और ओटीटी की बदलती दर्शक आदतों के बीच एक स्वाभाविक पुल बनाती है।

और आखिरकार, जब प्लेटफॉर्म से ज्यादा महत्वपूर्ण कहानी हो जाती है, तो सबसे बड़ा फायदा दर्शक का ही होता है।

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