पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत में हुई एक सर्वदलीय बैठक के दौरान दिए गए बयान को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। बैठक में एस. जयशंकर ने कहा कि भारत किसी भी स्थिति में “दलाल राष्ट्र” नहीं है, जिसका मतलब यह था कि देश अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के तहत फैसले लेता है और किसी के दबाव में काम नहीं करता।
इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। अशोक गहलोत ने इस बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की भाषा कूटनीतिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं है। उनका मानना है कि विदेश मंत्री जैसे संवेदनशील पद पर बैठे व्यक्ति को शब्दों का चयन बेहद सोच-समझकर करना चाहिए, क्योंकि इसका असर देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर पड़ सकता है।उन्होंने यह भी कहा कि यदि यह बयान अनजाने में दिया गया है तो इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए।
गहलोत के अनुसार, देशों के बीच संवाद और शांति स्थापित करने के प्रयासों के दौरान ऐसी टिप्पणियां स्थिति को और जटिल बना सकती हैं।वैश्विक हालात पर चिंता जताते हुए गहलोत ने कहा कि अगर मौजूदा संघर्षों पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। उन्होंने आशंका जताई कि लगातार बढ़ते तनाव से दुनिया किसी बड़े टकराव की ओर बढ़ सकती है।
गहलोत ने विपक्ष के रुख का जिक्र करते हुए कहा कि पहले भी वैश्विक परिस्थितियों को लेकर चेतावनी दी गई थी। उन्होंने राहुल गांधी के बयान का हवाला देते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।इसके अलावा, उन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों पर भी सवाल उठाए। नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच संबंधों को लेकर उन्होंने कहा कि अमेरिकी नेतृत्व का रवैया कभी दोस्ताना तो कभी आलोचनात्मक दिखाई देता है, जो असामान्य और चिंता का विषय हो सकता है।कुल मिलाकर, इस बयान को लेकर देश के भीतर राजनीतिक बहस तेज हो गई है और आने वाले समय में इस पर और प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं।

