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मोदी की सांस्कृतिक कूटनीति का स्वर्णिम अध्याय: योग से विश्व को मिला भारत का जीवन-दर्शन

डॉ धनंजय गिरि

21 जून अब केवल वर्ष का सबसे लंबा दिन भर नहीं रह गया है। यह तिथि आज भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और मानव कल्याण के वैश्विक संदेश का प्रतीक बन चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल और दूरदर्शिता के कारण अंतरराष्ट्रीय योग दिवस आज भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और सांस्कृतिक नेतृत्व का एक सशक्त कीर्ति स्तंभ बनकर उभरा है।

योग भारतीय सभ्यता की हजारों वर्षों पुरानी विरासत है। यह केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के समन्वय का विज्ञान है। वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा योग दिवस का प्रस्ताव रखा गया और रिकॉर्ड 177 देशों के समर्थन के साथ इसे स्वीकार किया गया। यह केवल एक कूटनीतिक सफलता नहीं थी, बल्कि भारत के सांस्कृतिक दर्शन की वैश्विक मान्यता भी थी।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस एक ऐसे वैश्विक उत्सव का रूप ले चुका है, जिसमें दुनिया के लगभग सभी महाद्वीपों के लोग भाग लेते हैं। न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर से लेकर पेरिस, लंदन, टोक्यो, सिडनी और अफ्रीका के विभिन्न देशों तक योग की गूंज सुनाई देती है। यह भारत की उस सॉफ्ट पावर का प्रमाण है, जिसने बिना किसी दबाव या संघर्ष के मानवता के कल्याण का मार्ग दुनिया के सामने रखा है।

विश्व को भारत का विशिष्ट व अप्रतिम उपहार है- योग। योग दर्शन मात्र नहीं, एक प्रायोगिक जीवन दर्शन है। यह व्यक्ति को दर्शनीय, दक्ष, संयमित, सुनियोजित व वंदनीय बना देता है।यह शरीर ,मन, मानस, जीवनचर्या, विचार,कार्य कुशलता व अभिव्यक्ति में पूर्णरूपेण अभिव्यक्त होता है। एक पहलवान को जैसे अपने परिचय देने की आवश्यकता नहीं होती उसका शरीर स्वयमेव उसे अभिव्यक्त करता है उसी तरह एक योगी को भी परिचय देने की आवश्यकता नहीं होती, उसका तेजोवलय, दीप्तिमान मुखमंडल, कान्तिमान व सुदर्शन देहयष्टि ही उसकी उद्घोषणा करती है।
योग की यह महत्ता rigveda के इसी richa से स्पष्ट हो जाती है –
यस्मादृते न सिद्धयति यज्ञ विपश्चततश्चन।स धीनाम् योगमिन्वति।। (प्रथम मंडल, richa- 7 )
चित्त वृत्तियों को नियंत्रित कर मानव के सर्वविध अभ्युदय का मार्ग “योग” न केवल लौकिक जीवन को आनन्दमय बनाता है बल्कि जीवात्मा को परमात्मा से भी जोड़ता है।
योग के प्रति भारतीय जन मन का सदा आकर्षण रहा है। योगी गोरखनाथ, मत्स्येन्द्र नाथ,भर्तृहरि विरजाभार लोककथा के माध्यम से आज भी हमारे लोकजीवन के कंठाहार बने हुए हैं।
महादेव शिव योग के आदिगुरू माने जाते हैं। कृष्ण, बुद्ध, महावीर ने भी अपने समय योग का प्रचार किया। जिसतरह से सूर्य नमस्कार 12 आसनों का समन्वित रूप है उसी तरह इस्लाम में नमाज भी 5 आसनों का समन्वित रूप है।आखिर क्यों न हो इब्राहिमी धर्म के पूर्व अरब क्षेत्र भी हिन्दू मतावलंबी ही था।
योग भारत के षड् दर्शनों का एक दर्शन है।इसके प्रणेता पतंजलि हैं। योग के आठ अंग माने जाते हैं। इसकारण इसे अष्टांग योग कहा जाता है। ये अष्टांग हैं- यम(समाजिक नैतिक अनुशासन),नियम(आत्मानुशासन), आसन(अवस्थाएं),प्राणायाम(श्वास-प्रश्वास नियंत्रण),प्रत्याहार(मन पर नियंत्रण)धारणा(अवधारणा),ध्यान(विचारशून्यता के साथ प्रकृति के साथ आत्मा को जोड़ने की प्रक्रिया), समाधि(प्रकृतिस्थ हो जाना)।
योग सूत्र में पतञ्जलि ने योग की परिभाषा देते हुए कहा है – “योगश्चित्तवृति निरोध:।”
स्वास्थ्य के लिए सर्वाधिक महत्ता मानसिक स्वास्थ्य को दिया है। सच में चित्त ही हमारी वृत्तियों को संचालित करता है। आज पूरा विश्व नकारात्मक मानसिकता के कारण अवसाद, अपराध,आतंकवाद, अपहरण, बालात्कार, हत्या,माब लिन्चिग,सामूहिक हिन्सा,युद्ध आदि से जूझ रहा है जो नकारात्मक व अनियंत्रित चित्त के कारण हो रही हैं। फलतः दुनिया को आज मानसिक स्वास्थ्य की अधिक आवश्यकता है। पतञ्जलि ने इसकी महत्ता उसी समय समझ ली धी ।अतः उन्होंने अंतरंग योग- धारणा,ध्यान, समाधि पर अधिक जोर दिया क्योकि मन दुरूस्त तो क्रियाकलाप दुरूस्त।
आज योग की इसी अपरिहार्यता को देखते हुए हमारे देश के यशस्वी प्रधान मंत्री सह भारत के सांस्कृतिक प्रतिनिधि माननीय नरेंद्र मोदी जी ने योग को अंगीकार करने का जो सुझाव दिया उसे 194 राष्ट्रों में से 175 राष्ट्रों ने इसकी उपयोगिता को समझते हुए तुरंत स्वीकार कर लिया। यह आधुनिक युग में प्राचीन भारतीय जीवन दृष्टि व पद्धति की जीत है। 21 जून को पूरे विश्व में विश्व योग दिवस के रूप में मनाया जाना योग का व्यक्ति के प्रकृति से मिलन की संस्कृति के संदेश का वैश्विक उद्घोष है जिसका श्रेय अवश्यमेव हमारे प्रधान मंत्री जी को जाता है जिन्होंने अपने प्रत्युत्पन्न मस्तिष्क से भारत के कीर्ति में चार चांद लगा दिया है।सर्वत्र शान्ति की कामना के साथ वसुधैव कुटुम्ब कम् व योगक्षेमम् वहाम्यहम् ” की अवधारणा को चरितार्थ करने की भावना के साथ हमारे योग की कीर्ति यात्रा सतत् प्रवाह मान रहेगी।

वर्तमान में विश्व अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। युद्ध, हिंसा, रक्तपात, मानसिक तनाव, अवसाद, असुरक्षा और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां मानव समाज को लगातार प्रभावित कर रही हैं। ऐसे दौर में योग केवल स्वास्थ्य का साधन नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित करने का मार्ग बनकर सामने आया है। योग मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है और उसे आत्मानुशासन, संयम तथा सकारात्मकता की ओर प्रेरित करता है।

योग की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सार्वभौमिकता है। यह किसी धर्म, भाषा, जाति या राष्ट्र की सीमाओं में बंधा नहीं है। यही कारण है कि आज योग मानवता के साझा कल्याण का माध्यम बन चुका है। योग से विश्व के योगक्षेम की जो धारा प्रवाहित हो रही है, वह एक प्राणधारा है, एक त्राणधारा है, जो शोकाकुल और संतप्त मन को आशा, शांति और आत्मविश्वास प्रदान करती है।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 की थीम “Yoga for Healthy Ageing” (स्वस्थ आयु के लिए योग) केवल एक स्वास्थ्य संबंधी संदेश नहीं है, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन के उस सनातन चिंतन का वैश्विक उद्घोष है, जो हजारों वर्षों से मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता आया है। यह थीम हमारे प्राचीन मंत्र “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” की आधुनिक अभिव्यक्ति है, जिसमें संपूर्ण मानवता के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना निहित है।

योग की सबसे बड़ी विशेषता इसकी समग्र दृष्टि है। यह केवल शरीर को स्वस्थ रखने की पद्धति नहीं, बल्कि मन, बुद्धि, आत्मा और समाज के संतुलन का विज्ञान है। पश्चिमी विचारधारा लंबे समय तक इस अवधारणा पर बल देती रही कि “Healthy Mind Lives in a Healthy Body” अर्थात स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है। भारतीय योग दर्शन इससे एक कदम आगे जाकर यह संदेश देता है कि स्वस्थ और संतुलित मन ही स्वस्थ शरीर तथा स्वस्थ विश्व का निर्माण करता है। जब मन संयमित, शांत और सकारात्मक होता है, तब व्यक्ति का व्यवहार, उसका स्वास्थ्य और उसका सामाजिक योगदान भी सकारात्मक दिशा में विकसित होता है।

आज विश्व जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां, मानसिक तनाव, अकेलापन और जीवनशैली जनित रोग गंभीर चिंता का विषय हैं। ऐसे समय में “योग फॉर हेल्दी एजिंग” केवल बुजुर्गों के लिए नहीं, बल्कि हर आयु वर्ग के लिए जीवन को संतुलित और ऊर्जावान बनाने का मार्ग प्रस्तुत करता है। योग व्यक्ति को शारीरिक रूप से सक्रिय, मानसिक रूप से जागरूक और भावनात्मक रूप से स्थिर बनाए रखने की क्षमता रखता है।

21 जून का दिन अब केवल खगोलीय दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह मानवता को स्वस्थ, संतुलित और शांतिपूर्ण जीवन का संदेश देने वाली तिथि बन गया है। यह दिन भारत की सांस्कृतिक चेतना का उत्सव है, भारतीय ज्ञान परंपरा की विजय का उत्सव है और उस विचार का उत्सव है जो पूरी दुनिया को “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से जोड़ता है। निस्संदेह, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस आज भारत की वैश्विक पहचान का एक उज्ज्वल प्रतीक बन चुका है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस प्रयास की भी सफलता है, जिसने योग को घर-घर से निकालकर विश्व मंच तक पहुंचाया और भारत को मानव कल्याण के मार्गदर्शक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक व संघ से जुड़े हैं। )

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