नई मुद्रा (करेंसी नोट) को चलन में लाना एक बेहद संगठित और चरणबद्ध प्रक्रिया होती है, जिसमें कई संस्थाएं मिलकर काम करती हैं। भारत में यह जिम्मेदारी मुख्य रूप से Reserve Bank of India (RBI) और केंद्र सरकार के बीच बांटी गई है।सबसे पहले, देश में नोटों की जरूरत का आकलन किया जाता है।
RBI, सरकार और अन्य वित्तीय संस्थानों के साथ मिलकर यह तय करता है कि कितनी मात्रा में और किस मूल्यवर्ग के नोटों की आवश्यकता है।इसके बाद डिजाइन की प्रक्रिया शुरू होती है। RBI का करेंसी प्रबंधन विभाग नए नोट का स्वरूप तैयार करता है, जिसमें सांस्कृतिक प्रतीक, चित्र और उन्नत सुरक्षा फीचर्स शामिल किए जाते हैं। इन सुरक्षा उपायों में वॉटरमार्क, सिक्योरिटी थ्रेड और माइक्रो-प्रिंटिंग जैसी तकनीकें होती हैं, जो नकली नोटों को रोकने में मदद करती हैं।डिजाइन तैयार होने के बाद इसे मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास भेजा जाता है।
अंतिम निर्णय सरकार ही लेती है—चाहे वह नोट का मूल्य हो, डिजाइन हो या अन्य विशेषताएं।मंजूरी मिलने के बाद नोटों की छपाई शुरू होती है। भारत में इसके लिए चार प्रमुख प्रेस हैं—नासिक और देवास, जो सरकार के अधीन हैं, तथा मैसूर और सालबोनी, जिन्हें RBI की सहायक कंपनी Bharatiya Reserve Bank Note Mudran Private Limited संचालित करती है।छपाई पूरी होने के बाद नए नोटों को RBI के इशू ऑफिस और बैंकों के करेंसी चेस्ट के जरिए पूरे देश में भेजा जाता है।
फिर ये नोट एटीएम और बैंक शाखाओं के माध्यम से आम लोगों तक पहुंचते हैं।दिलचस्प बात यह है कि जहां अधिकांश नोट RBI जारी करता है, वहीं ₹1 का नोट सीधे Ministry of Finance द्वारा जारी किया जाता है और उस पर वित्त सचिव के हस्ताक्षर होते हैं। दूसरी ओर, सिक्कों का निर्माण भी केंद्र सरकार ही करती है, हालांकि उनका वितरण RBI के माध्यम से किया जाता है।

