देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को हटाने की प्रक्रिया इन दिनों चर्चा में है। इसकी वजह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी का चुनाव आयोग के खिलाफ सख्त रुख है। वह चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर खुलकर विरोध कर रही हैं और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में खुद दलीलें भी पेश कर चुकी हैं।ममता बनर्जी ने यह भी साफ किया है कि वह मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने की पहल करना चाहती हैं, भले ही उन्हें यह पता है कि संसद में विपक्ष के पास इसके लिए जरूरी संख्या बल नहीं है। उनका कहना है कि यह कदम राजनीतिक संदेश देने के लिए अहम है।
CEC को हटाने का संवैधानिक प्रावधान क्या है?
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया के तहत हटाया जा सकता है, जिस प्रक्रिया से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसका मतलब यह है कि CEC को सामान्य प्रशासनिक आदेश से नहीं हटाया जा सकता।सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया अनुच्छेद 124(4) में दी गई है। इसके तहत संसद के उस सदन में, जहां प्रस्ताव लाया गया हो, मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है, साथ ही यह संख्या सदन की कुल सदस्य संख्या के 50 प्रतिशत से अधिक होनी चाहिए। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस प्रक्रिया को तकनीकी रूप से “महाभियोग” नहीं कहा जाता। महाभियोग शब्द का प्रयोग संविधान में केवल राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया के लिए किया गया है, जिसमें दोनों सदनों में कुल सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
ममता बनर्जी के लिए यह अभी क्यों मुश्किल है?
ममता बनर्जी खुद स्वीकार कर चुकी हैं कि संसद के मौजूदा गणित को देखते हुए CEC को हटाना संभव नहीं है। लोकसभा में 543 सदस्यों में से सत्तारूढ़ एनडीए के पास करीब 293 सांसद हैं, जबकि राज्यसभा में 245 में से लगभग 134 सदस्यों का समर्थन सरकार को हासिल है। इसके अलावा कुछ ऐसे दल भी हैं, जो महत्वपूर्ण मौकों पर सरकार का साथ देते रहे हैं। ऐसे में न सिर्फ तृणमूल कांग्रेस, बल्कि कांग्रेस और पूरे इंडिया गठबंधन के लिए भी मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का प्रयास फिलहाल सफल होता नहीं दिख रहा।

