हाल के वैश्विक तनावों के बीच होर्मुज स्ट्रेट फिर चर्चा में है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने इस अहम समुद्री मार्ग को और संवेदनशील बना दिया है। इसी दौरान चीन की तीखी प्रतिक्रिया और अमेरिका की चेतावनियों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या चीन इस इलाके पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सकता है?
वास्तविकता यह है कि चीन द्वारा सीधे सैन्य बल के जरिए होर्मुज स्ट्रेट पर कब्जा करने की संभावना बहुत कम है। यह क्षेत्र ईरान और ओमान के अधिकार क्षेत्र में आता है, और यहां किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई वैश्विक स्तर पर बड़े संघर्ष को जन्म दे सकती है। इसके अलावा, चीन खुद इस रास्ते से आने वाले तेल पर काफी निर्भर है, इसलिए यहां अस्थिरता उसके अपने हितों के खिलाफ भी जा सकती है।
हालांकि, चीन का तरीका सीधा सैन्य नियंत्रण नहीं बल्कि रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने का हो सकता है। ईरान के साथ उसकी बढ़ती साझेदारी इसी दिशा में इशारा करती है। माना जाता है कि ईरान के तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा चीन को जाता है। इस रिश्ते को मजबूत करके चीन इस क्षेत्र में बिना संघर्ष के अपना प्रभाव बढ़ा सकता है।पिछले कुछ वर्षों में चीन ने खाड़ी क्षेत्र और आसपास के समुद्री इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है।
इसे वह अपने ऊर्जा हितों की सुरक्षा और अमेरिका के प्रभाव को संतुलित करने के प्रयास के रूप में देखता है। अगर काल्पनिक रूप से चीन को इस क्षेत्र पर अधिक नियंत्रण या प्रभाव मिल जाता है, तो इसका सबसे बड़ा फायदा उसे ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता के रूप में मिल सकता है। साथ ही, वैश्विक तेल व्यापार में उसकी मुद्रा (युआन) की भूमिका भी मजबूत हो सकती है, जो लंबे समय में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संतुलन को बदल सकता है।
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर काफी निर्भर है। यदि क्षेत्र में किसी एक देश का प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ता है, तो इससे सप्लाई, कीमतों और रणनीतिक संतुलन पर असर पड़ सकता है।

