भोपाल के कलेक्टर इन दिनों सड़क सुरक्षा को लेकर काफी सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। शहर की सड़कों का निरीक्षण हो रहा है, दुर्घटना संभावित क्षेत्रों को चिन्हित किया जा रहा है और अधिकारियों को लगातार निर्देश दिए जा रहे हैं कि नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है। यह एक स्वागतयोग्य पहल है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है क्या भोपाल की समस्याएं सिर्फ सड़कों तक सीमित हैं? क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल सड़क सुरक्षा तक है, या फिर उसे उन नालों, सरकारी भूमियों और जल निकासी मार्गों की भी चिंता करनी चाहिए जिन पर वर्षों से भू-माफियाओं का कब्जा होता जा रहा है?
भोपाल का विस्तार जिस गति से हुआ है, उसी गति से शहर की प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था का विनाश भी हुआ है। नीलबड़, रातीबड़, मेंडोरा और मेंडोरी जैसे क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में जो हुआ है, वह किसी से छिपा नहीं है। सरकारी नालों पर प्लॉट काट दिए गए, सरकारी मेढ़ों को मिटा दिया गया, सरकारी सड़कों को निजी संपत्ति में बदल दिया गया और राजस्व अभिलेखों में दर्ज भूमि पर अवैध कॉलोनियां बस गईं। जिन नालों से कभी बरसात का पानी बहकर निकलता था, आज वहां मकान, बाउंड्रीवाल और प्लॉट बिकते दिखाई देते हैं।
सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि यह सब रातों-रात नहीं हुआ। यह प्रक्रिया वर्षों से चल रही है। हजारों वर्गफुट भूमि पर कब्जे हुए, सैकड़ों प्लॉट बिके, सड़कें बनीं, बिजली के खंभे लगे और मकान खड़े हो गए। लेकिन प्रशासन को कुछ दिखाई नहीं दिया। जब सब कुछ बन गया, तब कभी-कभार एक प्रेस नोट जारी कर दिया गया कि अवैध कॉलोनियों के विरुद्ध अभियान चलाया जा रहा है।
यदि वास्तव में भू-माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई हो रही है तो फिर नीलबड़, रातीबड़ और मेंडोरी में अवैध प्लाटिंग का कारोबार आज भी क्यों जारी है? आखिर वे कौन लोग हैं जो सरकारी नालों तक को बेचने का साहस रखते हैं? उन्हें यह भरोसा कौन देता है कि प्रशासन उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं करेगा?
आज भोपाल में मानसून दस्तक दे चुका है। हर साल बारिश के दौरान शहर के कई इलाके जलमग्न हो जाते हैं। प्रशासन इसके लिए कभी भारी वर्षा को दोष देता है, कभी नागरिकों को और कभी प्राकृतिक परिस्थितियों को। लेकिन कोई यह स्वीकार करने को तैयार नहीं होता कि जलभराव का सबसे बड़ा कारण नालों पर हुआ अतिक्रमण है।
प्रकृति ने पानी के बहाव के लिए रास्ते बनाए थे। उन रास्तों को बंद कर दिया गया। नालों को पाटकर कॉलोनियां बना दी गईं। तालाबों के कैचमेंट क्षेत्र तक नहीं छोड़े गए। परिणाम यह हुआ कि बरसात का पानी अब अपने प्राकृतिक मार्ग से नहीं निकल पाता। वह सड़कों पर भरता है, घरों में घुसता है और फिर प्रशासन राहत कार्यों की तस्वीरें खिंचवाता है।
विडंबना देखिए कि एक तरफ प्रशासन सड़क सुरक्षा की बात करता है और दूसरी तरफ उन्हीं सड़कों के किनारे जल निकासी व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। यदि नाले ही नहीं बचेंगे तो सड़कें कितने दिन सुरक्षित रहेंगी? जब पानी सड़क पर बहेगा तो दुर्घटनाएं भी बढ़ेंगी और सड़कें भी टूटेंगी। इसलिए सड़क सुरक्षा और जल निकासी एक-दूसरे से जुड़ी हुई व्यवस्थाएं हैं। इन्हें अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।
मेंडोरी क्षेत्र की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां अवैध प्लाटिंग का सिलसिला लगातार जारी है। सरकारी भूमि पर कब्जे हो रहे हैं और नालों का अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है। यदि यह सच है तो फिर प्रशासन की भू-माफिया विरोधी मुहिम आखिर कहां चल रही है? क्या यह अभियान केवल प्रेस कॉन्फ्रेंसों तक सीमित है?
मध्यप्रदेश सरकार लंबे समय से भू-माफियाओं के खिलाफ अभियान चलाने के दावे करती रही है। कई बार मुख्यमंत्री स्तर से भी बड़े-बड़े बयान आए कि माफियाओं को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन जमीन पर हालात कुछ और कहानी कहते हैं। यदि माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई इतनी प्रभावी होती तो सरकारी नालों पर प्लॉट नहीं बिक रहे होते और सरकारी भूमि पर कॉलोनियां नहीं बस रही होतीं।
प्रशासन को यह समझना होगा कि जनता केवल घोषणाएं नहीं, परिणाम देखना चाहती है। लोगों को यह जानने का अधिकार है कि नीलबड़, रातीबड़, मेंडोरा और मेंडोरी क्षेत्रों में कितनी सरकारी भूमि अतिक्रमण मुक्त कराई गई? कितने नालों को पुनर्जीवित किया गया? कितने अवैध निर्माण तोड़े गए? और कितने जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हुई?
क्योंकि भू-माफिया कभी अकेले काम नहीं करते। जहां बड़े पैमाने पर अवैध कॉलोनियां विकसित होती हैं, वहां प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण की आशंकाएं भी जन्म लेती हैं। यही कारण है कि जनता के मन में सवाल उठते हैं। इन सवालों का जवाब बुलडोजर की तस्वीरों से नहीं, बल्कि पारदर्शी कार्रवाई से दिया जा सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि कलेक्टर साहब सड़कों के साथ-साथ उन नालों का भी निरीक्षण करें जो सरकारी रिकॉर्ड में तो मौजूद हैं, लेकिन जमीन पर गायब हो चुके हैं। उन क्षेत्रों का भी दौरा करें जहां भू-माफियाओं ने प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को समाप्त कर दिया है। उन फाइलों को भी देखें जिनमें वर्षों से शिकायतें दबाकर रखी गई हैं।
क्योंकि यदि आज नालों और सरकारी भूमियों को नहीं बचाया गया तो कल भोपाल को जलभराव, पर्यावरणीय संकट और अव्यवस्थित शहरीकरण की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। तब सड़क सुरक्षा के सारे दावे भी पानी में बह जाएंगे।
भोपाल की जनता जानना चाहती है कि प्रशासन की नजर केवल सड़कों पर है या फिर उन नालों पर भी जो शहर की जीवनरेखा हैं। क्योंकि सच्चाई यही है कि जिस शहर के नाले मर जाते हैं, वहां विकास नहीं, केवल अव्यवस्था जन्म लेती है।
और भोपाल आज इसी सवाल का जवाब मांग रहा है। क्या प्रशासन भू-माफियाओं के खिलाफ वास्तव में लड़ रहा है, या फिर केवल उनकी बनाई हुई समस्याओं के चारों ओर निरीक्षण यात्रा कर रहा है?

