नयी दिल्ली। राजधानी दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में सोमवार को INDIA गठबंधन की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई, जिसमें कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, एनसीपी (शरद पवार गुट), पीडीपी सहित 23 विपक्षी दलों के शीर्ष नेता शामिल हुए। बैठक में राहुल गांधी, सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और सुप्रिया सुले समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।
बैठक शुरू होने से पहले सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की मुलाकात और दोनों नेताओं का एक-दूसरे को गले लगाना,इससे विपक्षी एकता का संदेश देने का प्रयास किया गया। बैठक की शुरुआत में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार और भाजपा पर आरोप लगाया कि संविधान पर लगातार हमला हो रहा है और केंद्रीय जांच एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक विरोधियों को डराने और दबाव में लेने के लिए किया जा रहा है। खरगे ने कहा कि जिस प्रकार 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में विपक्षी दलों ने महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक का विरोध करते हुए एकजुटता दिखाई थी, उसी भावना को आगे भी बनाए रखने की जरूरत है। उनके अनुसार विपक्ष की यह एकता लोकतांत्रिक संस्थाओं और संघीय ढांचे की रक्षा के लिए जरूरी है। बैठक में परिसीमन का मुद्दा प्रमुखता से उभरा। दक्षिण भारत के कई राज्यों और कुछ क्षेत्रीय दलों का मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को परिसीमन के जरिए राजनीतिक रूप से नुकसान हो सकता है। यही कारण है कि विपक्ष इसे केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संघीय संतुलन और राज्यों के अधिकारों से जुड़ा विषय बता रहा है।
विपक्ष आगामी चुनावी राजनीति में परिसीमन को एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, ताकि क्षेत्रीय दलों और राज्यों के हितों को केंद्र में लाया जा सके।खरगे ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए , कहा कि इस प्रक्रिया के कारण करोड़ों मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। विपक्षी दल लंबे समय से चुनावी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता को लेकर चिंता जताते रहे हैं और यह मुद्दा भी बैठक के प्रमुख एजेंडों में शामिल रहा। कांग्रेस अध्यक्ष ने देश में बढ़ती महंगाई, रोजगार सृजन की धीमी गति, एमएसएमई क्षेत्र की चुनौतियों और निजी क्षेत्र में बढ़ते एकाधिकार को लेकर भी केंद्र सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि परीक्षा प्रणाली के कुप्रबंधन और लगातार सामने आ रहे पेपर लीक मामलों ने युवाओं के भविष्य को प्रभावित किया है।
विपक्ष की रणनीति साफ दिखाई देती है कि वह केवल लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के मुद्दे तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि महंगाई, बेरोजगारी, किसानों और युवाओं के मुद्दों को भी अपने राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में रखना चाहता है। इस बैठक का सबसे बड़ा संदेश विपक्षी एकता का प्रदर्शन है। पिछले कुछ महीनों में विभिन्न राज्यों के चुनावों और राष्ट्रीय मुद्दों पर विपक्षी दलों के बीच मतभेदों की खबरें सामने आती रही हैं। ऐसे समय में 23 दलों का एक मंच पर आना भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
चुनौती यह भी है कि विभिन्न राज्यों में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी दल राष्ट्रीय स्तर पर कितनी प्रभावी एकजुटता दिखा पाते हैं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी, दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तथा कई अन्य राज्यों में क्षेत्रीय समीकरण विपक्ष के सामने बड़ी परीक्षा बने रहेंगे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बैठक केवल वर्तमान मुद्दों पर चर्चा तक सीमित नहीं है, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव और उससे पहले होने वाले राज्यों के चुनावों के लिए विपक्षी खेमे की दिशा तय करने का प्रयास भी है। परिसीमन, लोकतांत्रिक संस्थाएं, महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर साझा अभियान की रूपरेखा आने वाले दिनों में और स्पष्ट हो सकती है।
दिल्ली की यह महाबैठक यह संकेत जरूर दे रही है कि विपक्ष भाजपा के खिलाफ एक व्यापक राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने में जुट चुका है और आने वाले समय में इनकी एकता या अपने – अपने दलों की स्वार्थपरकता के कारण कितनी एकजुटता रहती है इसकी राजनीतिक स्पष्टता सामने आयेगी।

