अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त अरब अमीरात ने एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है। यूएई ने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक और उसके विस्तारित समूह ओपेक प्लस से अलग होने का ऐलान किया है। करीब 60 साल तक इस गठबंधन का हिस्सा रहने के बाद यूएई ने बदलते वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य और अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया।
ओपेक एक ऐसा संगठन है जो दुनिया में तेल उत्पादन और उसकी कीमतों को संतुलित रखने के लिए सदस्य देशों के बीच समन्वय करता है। वहीं ओपेक+ में रूस जैसे बड़े तेल उत्पादक देश भी शामिल हैं। ऐसे में यूएई का बाहर निकलना इस समूह के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, खासकर सऊदी अरब के लिए, जो इस संगठन में प्रमुख भूमिका निभाता है।दरअसल, यूएई लंबे समय से अधिक उत्पादन कोटा की मांग कर रहा था, क्योंकि उसकी उत्पादन क्षमता ओपेक द्वारा तय सीमा से ज्यादा है।
यही असहमति अब अलग होने की वजह बनी। वर्तमान में यूएई वैश्विक तेल उत्पादन में लगभग 3–4% का योगदान देता है और दुनिया के बड़े उत्पादकों में गिना जाता है।विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से ओपेक की कुल उत्पादन क्षमता पर असर पड़ेगा और संगठन की एकजुटता कमजोर हो सकती है। इसके अलावा, यह कदम अन्य सदस्य देशों को भी भविष्य में ऐसे निर्णय लेने के लिए प्रेरित कर सकता है।इस घटनाक्रम का असर वैश्विक तेल बाजार पर भी दिख सकता है।
खासकर जब होर्मुज जलडमरूमध्य पहले से ही भू-राजनीतिक तनाव के कारण चर्चा में है। यदि यूएई अपने उत्पादन में बढ़ोतरी करता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आ सकती है, लेकिन फिलहाल बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।भारत के नजरिए से देखें तो यूएई एक अहम व्यापारिक साझेदार है और निवेश का भी बड़ा स्रोत है। ऐसे में इस फैसले का असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है, हालांकि इसके स्पष्ट परिणाम समय के साथ ही सामने आएंगे।

