पटना: बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव ने बिहार की राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस सीट पर जन सुराज के प्रशांत किशोर, भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा और राजद की रेखा गुप्ता के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है। चुनाव परिणाम न केवल उम्मीदवारों की किस्मत तय करेंगे, बल्कि भाजपा के लंबे समय से कायम वर्चस्व और प्रशांत किशोर की राजनीतिक साख की भी परीक्षा होगी।
पटना पश्चिम से बांकीपुर तक का सफर
आज की बांकीपुर विधानसभा सीट पहले पटना पश्चिम के नाम से जानी जाती थी। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद इसका नाम बदलकर बांकीपुर कर दिया गया। इस सीट पर पहला विधानसभा चुनाव 1957 में हुआ था, जिसमें कांग्रेस के रामशरण साव पहले विधायक चुने गए। इसके बाद 1962 में कांग्रेस के कृष्ण बल्लभ सहाय ने जीत दर्ज की।
समय के साथ बदलते रहे राजनीतिक समीकरण
इस सीट ने कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा विधायक बने, लेकिन उनके इस्तीफे के बाद 1969 के उपचुनाव में सीपीआई के ए.के. सेन विजयी रहे। 1972 में सीपीआई के सुनील मुखर्जी ने जीत हासिल की, जबकि 1977 में जनता पार्टी के ठाकुर प्रसाद ने बाजी मारी। 1980 में कांग्रेस के रणजीत सिन्हा ने सीट दोबारा कांग्रेस के खाते में पहुंचाई।
1985 का चुनाव बना सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर
बांकीपुर के चुनावी इतिहास में 1985 का चुनाव सबसे यादगार माना जाता है। निर्दलीय उम्मीदवार रामानंद यादव ने सभी प्रमुख दलों को पीछे छोड़ते हुए जीत दर्ज की। इसे आज भी इस सीट का सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर माना जाता है।
1995 के बाद भाजपा का अभेद्य किला
1995 के विधानसभा चुनाव से बांकीपुर की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। भाजपा के नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने जीत हासिल कर इस सीट पर पार्टी का दबदबा स्थापित किया। इसके बाद उन्होंने 2000, फरवरी 2005 और अक्टूबर 2005 के चुनाव भी लगातार जीते, जिससे यह सीट भाजपा का मजबूत गढ़ बन गई।
नितिन नवीन ने कायम रखा जीत का सिलसिला
2006 में नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके पुत्र नितिन नवीन पहली बार विधायक बने। सीट का नाम बदलकर बांकीपुर होने के बाद भी भाजपा का विजय अभियान नहीं रुका। नितिन नवीन ने 2010, 2015, 2020 और 2025 के विधानसभा चुनावों में लगातार जीत दर्ज कर पार्टी की पकड़ और मजबूत कर दी।
हर चुनाव में रहा भाजपा का मजबूत प्रदर्शन
पिछले कई चुनावों में भाजपा ने बड़े अंतर से जीत हासिल की है।
- 2010: 60,840 वोटों से जीत
- 2015: 39,767 वोटों से जीत
- 2020: 39,036 वोटों का अंतर
- 2025: लगभग 63 प्रतिशत मत प्राप्त कर 51 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीत
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि पिछले तीन दशकों से यह सीट भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ों में शामिल रही है।
कई दिग्गजों को मिली हार
बांकीपुर विधानसभा सीट पर कई चर्चित नेताओं को भी हार का सामना करना पड़ा है। 2020 के चुनाव में अभिनेता लव सिन्हा भाजपा के नितिन नवीन से पराजित हुए। उसी चुनाव में पुष्पम प्रिया चौधरी भी मैदान में थीं, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सकीं।
इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय, पूर्व केंद्रीय मंत्री राम कृपाल यादव तथा कांग्रेस के राजेश कुमार जैसे नेताओं को भी इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा है।
क्या इस बार बदलेगा इतिहास?
बांकीपुर उपचुनाव ने एक बार फिर इस सीट को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। भाजपा पिछले 30 वर्षों से अधिक समय से इस सीट पर अपना वर्चस्व बनाए हुए है, जबकि जन सुराज के प्रशांत किशोर ने इस चुनाव को अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया है।
अब सबकी निगाहें मतगणना के अंतिम परिणाम पर टिकी हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा अपना विजय अभियान जारी रखेगी, या फिर 1985 की तरह बांकीपुर एक नया राजनीतिक इतिहास रचेगा।

