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स्वदेशी मंत्र: आरएसएस के ‘स्वदेशी जागरण मंच’ से भाजपा के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की दूरदृष्टि समझिए (भाग- 2)

@ कमलेश पांडेय/वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

(गतांक से आगे)
साल 1991 से वर्ष 2026 तक में आरएसएस के ‘स्वदेशी जागरण मंच’ से भाजपा के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान तक पर गौर फरमाते हुए बहुत कुछ पता चलता हैं! कुछ कड़वे अनुभवों से लबालब भरे हुए हैं तो कुछ मीठे फलों के स्वाद सभी चख रहे हैं। यह ठीक है कि भाजपा नीति राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को चलाते वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की कुछ मजबूरियां रही होंगी, जिसकी कीमत उन्होंने 2004 में अपनी सरकार गंवा कर चुकाई!

सवाल है कि क्या उनकी मजबूरियों से सबक लेते हुए और सियासी जज्बातों से परे हटकर एनडीए के भाजपाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 35 साल बाद ही सही पर RSS का आर्थिक एजेंडा अपनाया है? तो जवाब होगा कि क्रमबद्ध रूप से इसे समझिए जो निम्नलिखित चरणों से गुजरते हुए यहाँ तक पहुंचा है।

खासकर, वर्ष 1991 में कांग्रेस गठबंधन वाली केंद्र सरकार ने जब भारत में आर्थिक उदारीकरण का रास्ता चुना था, तो उसी दौर में भारतीय जनता पार्टी की मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच (SJM) ने एक बिल्कुल अलग आर्थिक चेतावनी सामने रखी और बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था को विदेशी पूंजी, आयात और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर अत्यधिक निर्भर नहीं होना चाहिए।

लेकिन हद तब हो गया जब भाजपाई प्रधानमंत्रियों अटल बिहारी बाजपेयी और नरेंद्र मोदी ने भी अपने ही मातृ संगठन के राष्ट्रीय जज्बातों की घोर उपेक्षा की। लेकिन जब बदलती वैश्विक राजनीति में भारतीय मुद्रा और कारोबार को झटके पर झटके लगे और निजीकरण व उदारीकरण के ज्वार से भाटा की ओर जब भारतीय अर्थव्यवस्था उन्मुख हुई तो फिर तीन दशक के अधिक समय बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति में स्वदेशी मंत्र यानी ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘मेक इन इंडिया’ और घरेलू उत्पादन जैसे नारे केंद्रीय आर्थिक भाषा बन चुके हैं।

यहीं एक बड़ा सवाल पैदा होता है कि….क्या साल 2026 का ‘आत्मनिर्भर भारत’ दरअसल 1990 के दशक के उसी ‘स्वदेशी’ एजेंडे का नया, राजनीतिक रूप से स्वीकार्य संस्करण है, जिसे कभी भाजपा की सरकारों ने भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था? इस प्रश्न का उत्तर सीधा ‘हाँ’ या ‘ना’ नहीं है। असली कहानी इससे कहीं अधिक जटिल है। आइए इसे क्रमबद्ध रूप से समझते हैं:-

जानिए 1991 में उदारीकरण के समानांतर कैसे खड़ा हुआ ‘स्वदेशी’ अभियान?

22 नवंबर 1991 को “स्वदेशी जागरण मंच” का गठन उस समय हुआ जब भारत आर्थिक संकट से निकलने के लिए नई आर्थिक नीति अपना रहा था। उस वक्त कांग्रेसी प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली सरकार और उसके तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह (अब भूतपूर्व स्व. प्रधानमंत्री) ने अर्थव्यवस्था को उदार बनाने, आयात प्रतिबंधों को कम करने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजार से जोड़ने की दिशा में अत्यावश्यक कदम बढ़ाए।

लोकहितैशी संगठन “स्वदेशी जागरण मंच” ने इस दिशा पर सवाल उठाया।

तब लोकहितैशी संगठन “स्वदेशी जागरण मंच” का तर्क था कि आर्थिक विकास का अर्थ केवल विदेशी निवेश आकर्षित करना नहीं है, बल्कि भारत की उत्पादन क्षमता, घरेलू उद्योग, छोटे कारोबार, रोजगार और आर्थिक संप्रभुता को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यानी 1990 के दशक में भारत के सामने दो अलग-अलग आर्थिक दर्शन दिखाई दे रहे थे— पहला, उदारीकरण यानी विश्व बाजार से जुड़ो, पूंजी आकर्षित करो, और प्रतिस्पर्धा बढ़ाओ। और दूसरा,
स्वदेशी यानी घरेलू उत्पादन बचाओ, स्थानीय उद्योग मजबूत करो और विदेशी निर्भरता सीमित करो, ताकि डॉलर के खेल में न फंसे भारत। किंतु विदेशी परस्त कांग्रेसी सरकार ने किसी की भी एक नहीं सुनी। संयुक्त मोर्चा सरकारों ने भी नौकरशाही का ही एजेंडा चलाया, ताकि उनकी जेबें गर्म होती रहें।

लेकिन असली परीक्षा भाजपा की सत्ता में आने के बाद शुरू हुई

अगर स्वदेशी केवल कांग्रेस-विरोधी राजनीतिक हथियार होता तो कहानी बहुत आसान होती। लेकिन जब 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आई तो फिर यहीं से स्वदेशी विचारधारा की सबसे कठिन परीक्षा शुरू हुई। क्योंकि तब एनडीए गठबंधन वाली वाजपेयी सरकार को भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने, निवेश बढ़ाने, बुनियादी ढांचे का विस्तार करने और आर्थिक विकास की गति तेज करने की जरूरत थी। लिहाजा बाजपेयीसरकार ने उदारीकरण और निजीकरण की दिशा में कई कदम उठाए। यहीं से स्वदेशी जागरण मंच और भाजपा सरकार के बीच वैचारिक तनाव साफ दिखाई देने लगा।

तब भी स्वदेशी समर्थक संगठनों ने विदेशी निवेश, विनिवेश और कुछ आर्थिक सुधारों का विरोध किया। इसका अर्थ यह नहीं था कि संघ परिवार सरकार के खिलाफ खड़ा हो गया, बल्कि तस्वीर अधिक जटिल थी। तब संगठन की वैचारिक प्राथमिकताएँ और सरकार की व्यावहारिक आर्थिक जरूरतें अलग-अलग थीं। इसलिए सवाल उठता है कि तब क्या संघ मौन रहा? यह दावा कि संघ पूरी तरह मौन रहा, ऐतिहासिक रूप से सटीक नहीं होगा। क्योंकि
RSS और उससे जुड़े संगठनों ने समय-समय पर वैश्वीकरण, विदेशी पूंजी और आर्थिक नीतियों पर आपत्तियाँ उठाईं। स्वदेशी जागरण मंच ने कई नीतिगत फैसलों का विरोध किया।

लेकिन दूसरा सवाल अधिक महत्वपूर्ण है—क्या उस विरोध ने भाजपा सरकार की आर्थिक दिशा बदल दी? अधिकांश मामलों में जवाब है—पूरी तरह नहीं। यही वह जगह है जहाँ संघ परिवार और भाजपा की सत्ता-राजनीति के बीच संबंध को समझना आवश्यक है। संघ के पास वैचारिक प्रभाव था, लेकिन सरकार को बजट, निवेश, रोजगार, विकास दर, राजकोषीय स्थिति और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों जैसे व्यावहारिक प्रश्नों का सामना करना पड़ता था। इसलिए ‘स्वदेशी’ विचार को पूरी तरह लागू करना सत्ता के लिए उतना सरल नहीं था।

अब समझिए कि मनमोहन सिंह सरकार ने क्या बदला?

जब 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाला UPA सत्ता में आई तो
उदारीकरण की दिशा समाप्त नहीं हुई, बल्कि आर्थिक वैश्वीकरण, सेवा क्षेत्र, विदेशी निवेश और निजी क्षेत्र की भूमिका आगे बढ़ती रही। हालांकि, विडंबना यह थी कि जिस उदारीकरण की वैचारिक आलोचना स्वदेशी जागरण मंच करता रहा था, उसी आर्थिक ढांचे में भारत ने तेज विकास, बढ़ते सेवा क्षेत्र और वैश्विक आर्थिक एकीकरण का दिलचस्प अनुभव किया। इसका मतलब यह नहीं कि स्वदेशी की सारी आशंकाएँ गलत थीं। किसानों, छोटे उद्योगों, रोजगार, आयात निर्भरता और आर्थिक असमानता से जुड़े प्रश्न लगातार बने रहे। यानी भारत ने उदारीकरण अपनाया, लेकिन स्वदेशी का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ। वह लगातार पृष्ठभूमि में मौजूद रहा। (क्रमशः)

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