कृष्णमोहन झा
नई दिल्ली। मध्यप्रदेश, गुजरात और बिहार की तीन विधानसभा सीटों पर हुए हालिया उपचुनावों के परिणामों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए मिले-जुले संकेत दिए हैं। गुजरात की मांजलपुर सीट पर अपेक्षित जीत दर्ज करने के बावजूद पार्टी को मध्यप्रदेश की दतिया और बिहार की बांकीपुर सीट पर हार का सामना करना पड़ा। इनमें सबसे अधिक राजनीतिक चर्चा बांकीपुर उपचुनाव की रही, जहां पिछले लगभग तीन दशकों से भाजपा का कब्जा रहा था।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बांकीपुर सीट भाजपा के लिए केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती रही है। भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने इस सीट से लगातार पांच बार जीत दर्ज कर इसे पार्टी का मजबूत गढ़ बनाया था। उनके राज्यसभा जाने के बाद हुए पहले ही उपचुनाव में यह सीट भाजपा के हाथ से निकल गई।
जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपने पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी नवीन सिन्हा को लगभग 19 हजार मतों से पराजित कर सभी को चौंका दिया। जीत के बाद उन्होंने कहा कि भाजपा के “30 वर्षों पुराने किले को 30 दिनों में ध्वस्त कर दिया गया।”
भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश
बिहार विधानसभा में भाजपा की एक सीट कम होने से फिलहाल सरकार की स्थिरता पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में हुए पहले उपचुनाव में मिली हार ने राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी भाजपा के लिए अपेक्षित जनस्वीकार्यता हासिल कर पाए हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद से ही सम्राट चौधरी को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं और बांकीपुर का परिणाम इन चर्चाओं को और बल देता है।
उम्मीदवार चयन भी बना चर्चा का विषय
चुनाव के दौरान भाजपा ने पहले घोषित उम्मीदवार अभिषेक बंटी की जगह नवीन सिन्हा को मैदान में उतारा। आधिकारिक तौर पर इसे पारिवारिक कारण बताया गया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर कई तरह की चर्चाएं होती रहीं।
दूसरी ओर, प्रशांत किशोर पूरे चुनाव अभियान के दौरान लगातार सक्रिय रहे। उन्होंने भाजपा पर अति आत्मविश्वास का आरोप लगाया और शिक्षा, रोजगार तथा विकास जैसे मुद्दों को चुनाव के केंद्र में रखा। उन्होंने जातीय और धार्मिक समीकरणों से हटकर सुशासन और स्वच्छ राजनीति की बात की, जिसे विशेषकर युवा मतदाताओं के बीच सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली।
युवा मतदाता बने निर्णायक
बांकीपुर में बड़ी संख्या में शिक्षित और युवा मतदाता हैं। इस बार मतदान प्रतिशत पिछले चुनाव के 41 प्रतिशत से घटकर लगभग 35 प्रतिशत रह गया। माना जा रहा है कि भाजपा के पारंपरिक समर्थक मतदाताओं का एक वर्ग मतदान के प्रति उदासीन रहा, जबकि जन सुराज पार्टी अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक लाने में अधिक सफल रही।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह भी मानना है कि हाल के कुछ घटनाक्रम, जिनमें छात्र आंदोलनों और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दे शामिल रहे, उनका असर भी चुनावी माहौल पर पड़ा।
प्रशांत किशोर की नई राजनीतिक शुरुआत
गौरतलब है कि पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन अधिकांश सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा था। उस चुनाव में प्रशांत किशोर स्वयं उम्मीदवार नहीं बने थे। बांकीपुर उपचुनाव उनकी पहली चुनावी जीत है और अब वे बिहार विधानसभा में अपनी पार्टी के एकमात्र विधायक होंगे।
हालांकि संख्या बल के लिहाज से उनकी भूमिका सीमित होगी, लेकिन लंबे समय तक विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर अब विधानसभा के भीतर विपक्ष की नई आवाज बन सकते हैं। उनकी राजनीतिक सक्रियता आने वाले समय में बिहार की राजनीति को नया आयाम दे सकती है।
(लेखक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

