मुंबई में ‘इच्छामृत्यु’ (पैसिव यूथेनेशिया) का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। हाल ही में एक मरीज को सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने और उनके निधन के बाद इस विषय पर बहस तेज हो गई है। इसके साथ ही यह भी सामने आया है कि पिछले दो वर्षों में मुंबई महानगरपालिका के पास इस संबंध में कई आवेदन जमा हुए हैं।
साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में गंभीर और असाध्य रोगों से पीड़ित मरीजों को कुछ शर्तों के तहत पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी थी। इसके बाद स्थानीय प्रशासन को ऐसे मामलों में आवेदन स्वीकार करने की जिम्मेदारी दी गई। मुंबई में अलग-अलग क्षेत्रों के चिकित्सा अधिकारियों के पास अब तक कई आवेदन पहुंचे हैं, जो इस विषय को लेकर लोगों की बढ़ती जागरूकता और चिंता को दर्शाते हैं।हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन आवेदनों पर आगे की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है।
काफी समय बीतने के बावजूद यह तय नहीं हो पाया है कि किन परिस्थितियों में और किस तरह से अंतिम निर्णय लिया जाएगा। कानूनी, मेडिकल और प्रशासनिक स्तर पर कई सवाल अब भी अनसुलझे हैं।विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में मरीज की स्थिति, परिवार की सहमति, मेडिकल बोर्ड की राय और कानूनी जांच जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी होता है।
इसके अलावा, यदि आवेदन एक शहर में किया गया हो और मरीज की मृत्यु किसी अन्य स्थान पर हो, तो अधिकार क्षेत्र को लेकर भी भ्रम की स्थिति बनती है।सरकार द्वारा एक डिजिटल पोर्टल तैयार किया गया है, जिसमें इन मामलों का रिकॉर्ड रखा जा सकता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसका उपयोग अभी शुरू नहीं हो पाया है। इस कारण प्रक्रिया और भी धीमी हो गई है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इस संवेदनशील विषय पर स्पष्ट और व्यावहारिक दिशा-निर्देश तय करना जरूरी है, ताकि मरीजों और उनके परिवारों को अनिश्चितता और परेशानी का सामना न करना पड़े।उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में सरकार इस विषय पर ठोस नीति बनाकर प्रक्रिया को स्पष्ट करेगी।

