ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने सरकार की चुप्पी की आलोचना करते हुए इसे भारत की कूटनीतिक परंपरा से अलग रुख बताया। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या खामेनेई को वास्तव में भारत का करीबी या “दोस्त” माना जा सकता है।
क्या खामेनेई भारत समर्थक थे?
ऐतिहासिक रिकॉर्ड देखें तो खामेनेई ने कई मौकों पर भारत सरकार की नीतियों की सार्वजनिक आलोचना की थी।1. 2017 में उन्होंने मुस्लिम देशों से कश्मीर के मुसलमानों के समर्थन की अपील की थी।2. 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद उन्होंने भारत से “सही नीति” अपनाने की बात कही थी। इस बयान पर भारत ने ईरानी राजदूत को तलब कर आपत्ति दर्ज कराई थी।3. 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को लेकर हुई हिंसा के दौरान उन्होंने सोशल मीडिया पर भारत की आलोचना की और “Indian Muslims in Danger” जैसे हैशटैग का इस्तेमाल किया।4. 2024 में एक पोस्ट में उन्होंने भारत की तुलना म्यांमार और गाजा की स्थिति से की, जिस पर नई दिल्ली ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी।इन बयानों के आधार पर विशेषज्ञ मानते हैं कि खामेनेई का रुख कई बार भारत की आंतरिक नीतियों के प्रति आलोचनात्मक रहा।
भारत का वर्तमान रुख क्यों संतुलित है?
भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक, ऊर्जा और रणनीतिक संबंध रहे हैं, लेकिन नई दिल्ली की पश्चिम एशिया नीति व्यापक संतुलन पर आधारित है।मध्य पूर्व में लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक रहते हैं।सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन जैसे देश भारत के महत्वपूर्ण व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार हैं।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के दिनों में कई क्षेत्रीय नेताओं से बातचीत की है, जिससे संकेत मिलता है कि भारत अपनी कूटनीति को व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता और अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप साध रहा है।
मुस्लिम देशों की प्रतिक्रिया
Organisation of Islamic Cooperation (OIC) के 57 सदस्य देशों में से अपेक्षाकृत कम देशों ने सार्वजनिक रूप से शोक जताया। वहीं रूस, चीन, उत्तर कोरिया, पाकिस्तान, इराक, मलेशिया और तुर्की जैसे देशों ने हमलों की निंदा या शोक व्यक्त किया।खामेनेई और भारत के संबंधों को “दोस्ती” के पारंपरिक अर्थ में परिभाषित करना कठिन है। दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक और रणनीतिक संबंध जरूर रहे, लेकिन कई मुद्दों पर सार्वजनिक मतभेद भी सामने आए। मौजूदा परिदृश्य में भारत का रुख मुख्यतः अपने राष्ट्रीय हितों, क्षेत्रीय स्थिरता और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने पर केंद्रित दिखाई देता है।

