Thursday, March 19, 2026
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क्या अमेरिका से तेल खरीदना भारत को महंगा पड़ रहा है?

अमेरिका से कच्चा तेल खरीद को लेकर भारत की ऊर्जा नीति पर नई बहस शुरू हो गई है। वैश्विक राजनीति और प्रतिबंधों के बीच भारत के आयात पैटर्न में बदलाव दिखाई दे रहा है, जिस पर विशेषज्ञ अलग-अलग राय दे रहे हैं।

जानकार क्या कहते हैं?

रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चलने का कहना है कि अमेरिका की ओर से भारत पर रूसी तेल की खरीद कम करने का दबाव बनाया जा रहा है। उनके अनुसार, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के कार्यकाल में भी इसी तरह के दबाव के चलते भारत ने Iran से तेल आयात लगभग बंद कर दिया था, जबकि ईरान उस समय रियायती दरों पर कच्चा तेल दे रहा था।विशेषज्ञों का तर्क है कि अमेरिका से आयातित तेल, खासकर लंबी दूरी की शिपिंग लागत जोड़ने के बाद, मध्य पूर्व के कई देशों के तेल की तुलना में महंगा पड़ सकता है। हालांकि सरकार का कहना है कि ‘इंपोर्ट डाइवर्सिफिकेशन’ यानी आयात स्रोतों में विविधता लाना ऊर्जा सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal भी पहले इस नीति को ऊर्जा संतुलन के लिए जरूरी बता चुके हैं।दूसरी ओर, China ने Russia और ईरान से रियायती दरों पर तेल की खरीद बढ़ाई है। रूस और ईरान का कच्चा तेल कई बार अंतरराष्ट्रीय ब्रेंट बेंचमार्क से 9 से 11 डॉलर प्रति बैरल तक कम कीमत पर उपलब्ध रहा है। इससे चीन की ऊर्जा लागत कम रहती है, जो उसकी औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को मजबूती देती है।रिपोर्टों के अनुसार, 2025-26 में भारत के कुल तेल आयात में रूसी हिस्सेदारी घटकर लगभग 33–35 प्रतिशत रह गई है, जबकि अमेरिकी तेल की हिस्सेदारी में वृद्धि हुई है। पहले भारत को रूस से प्रतिदिन लगभग 1.8 से 2 मिलियन बैरल तेल मिलता था, जो घटकर करीब 1.1 से 1.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया है।

वहीं चीन ने रूस से अपनी खरीद बढ़ाकर रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दी है।हाल ही में व्यापार समझौतों के संदर्भ में अमेरिका ने भारत पर लगाए गए कुछ टैरिफ हटाने की घोषणा की थी। हालांकि भारत ने आधिकारिक रूप से रूस से तेल आयात पूरी तरह बंद करने की बात नहीं कही है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और भुगतान व्यवस्था में बदलाव के कारण खरीद की शर्तें प्रभावित हुई हैं, जिससे भारत को वैकल्पिक स्रोतों—जैसे लैटिन अमेरिकी देशों—की ओर भी देखना पड़ रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने चुनौती संतुलन बनाने की है।

एक ओर उसे रणनीतिक साझेदारियों को बनाए रखना है, तो दूसरी ओर सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करनी है। ऊर्जा आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत के लिए हर निर्णय का सीधा असर आर्थिक विकास और प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है।अब सवाल यह है कि भारत अपनी ऊर्जा नीति को किस हद तक राजनीतिक दबाव से अलग रख पाता है और बदलते वैश्विक तेल बाजार में अपने आर्थिक हितों की रक्षा कैसे करता है।

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