सुशील देव
कॉरपोरेट जगत में सीएसआर यानी कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी को लंबे समय तक कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन समय के साथ इसकी परिभाषा बदल रही है। आज सवाल यह नहीं है कि किसी कंपनी ने सीएसआर पर कितना पैसा खर्च किया, बल्कि यह है कि उस खर्च से समाज में कितना स्थायी बदलाव आया। इसी संदर्भ में इंडियन पोटाश लिमिटेड यानी आईपीएल फाउंडेशन की हाल की गतिविधियां ध्यान आकर्षित करती हैं। कृषि, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में फाउंडेशन की पहल यह संकेत देती हैं कि सीएसआर को केवल औपचारिक गतिविधि के बजाय सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के रूप में देखा जा रहा है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह दृष्टिकोण विशेष महत्व रखता है।
भारत की विकास यात्रा गांवों और खेतों से होकर गुजरती है। देश में कृषि की चुनौतियां अब केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं। मिट्टी की घटती गुणवत्ता, जल संकट, मौसम में बदलाव, बढ़ती लागत और नई तकनीकों तक किसानों की सीमित पहुंच जैसी समस्याएं सामने हैं। ऐसे में यदि सीएसआर का पैसा किसान को केवल एक सुविधा देने के बजाय उसे ज्ञान, तकनीक और बेहतर कृषि पद्धति से जोड़ने में लगाया जाए, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक हो सकता है। आईपीएल फाउंडेशन की सतत कृषि, किसान प्रशिक्षण और आधुनिक कृषि तकनीक से जुड़ी पहल इसी दिशा की ओर संकेत करती हैं। विशेष रूप से गन्ने जैसी फसलों में जल बचत, बेहतर पोषण, आधुनिक सिंचाई और प्रिसीजन फार्मिंग को बढ़ावा देने की कोशिशें किसानों की उत्पादकता के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी मदद कर सकती हैं।
अब सवाल उठता है कि सीएसआर की सफलता को कैसे मापा जाए। किसी कार्यक्रम में कितने लोग शामिल हुए, कितने पौधे लगाए गए या कितने प्रशिक्षण आयोजित किए गए, ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। असली सवाल होना चाहिए कि इससे किसानों की आय में कितना बदलाव आया, पानी की कितनी बचत हुई तथा मिट्टी की गुणवत्ता कितनी सुधरी? साथ ही इससे कितने युवाओं को रोजगार या नए अवसर मिले और कितने गांवों में जीवन की गुणवत्ता बेहतर हुई? यह भी महत्वपूर्ण सवाल होंगे। यही वह जगह है जहां सीएसआर और वास्तविक सामाजिक परिवर्तन के बीच अंतर दिखाई देता है। यानी आईपीएल फाउंडेशन जैसी संस्थाओं के लिए भी आने वाले समय में अपने कार्यक्रमों के खास सामाजिक परिणाम सामने रखना महत्वपूर्ण होगा। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि दूसरे कॉरपोरेट संस्थानों को भी बेहतर सीएसआर मॉडल अपनाने की प्रेरणा मिलेगी।
जहां तक भविष्य में निवेश की बात है, तो शिक्षा में निवेश की पहल जरूरी है। कृषि को आधुनिक बनाने के लिए केवल किसान को प्रशिक्षित करना पर्याप्त नहीं है। कृषि के भविष्य के लिए नई पीढ़ी को भी तैयार करना होगा। कृषि विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के साथ साझेदारी, विद्यार्थियों के लिए इंटर्नशिप और ग्रामीण क्षेत्रों में व्यावहारिक अनुभव जैसी पहल इसी कारण महत्वपूर्ण हैं। आज का विद्यार्थी कल का कृषि वैज्ञानिक, उद्यमी, नीति विशेषज्ञ या ग्रामीण विकास कार्यकर्ता हो सकता है। उसे खेत और गांव की वास्तविक समस्याओं से जोड़ना देश के कृषि भविष्य में निवेश है। सीएसआर की दृष्टि से एक और महत्वपूर्ण बदलाव है, तत्काल सहायता से आगे बढ़कर भविष्य की क्षमता निर्माण। अब गांवों को केवल लाभार्थी नहीं, भागीदार बनने की आवश्यकता है। सीएसआर कार्यक्रमों में सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि गांवों को केवल ‘लाभार्थी’ न माना जाए। उन्हें विकास प्रक्रिया का भागीदार बनाया जाए। किसान क्या चाहता है, गांव की प्राथमिक समस्या क्या है, स्थानीय संसाधन क्या हैं और किस समाधान को लंबे समय तक अपनाया जा सकता है। इन सवालों का जवाब स्थानीय समुदाय की भागीदारी से ही मिल सकता है। यदि सीएसआर कार्यक्रम स्थानीय जरूरतों और स्थानीय ज्ञान के साथ जुड़ते हैं, तो उनके टिकाऊ होने की संभावना बढ़ जाती है।
इन सबमें एक महत्वपूर्ण कड़ी यह भी है कि अब पर्यावरण और विकास को साथ लेकर चलना होगा। आज कृषि और पर्यावरण को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। पानी बचेगा तो खेती बचेगी, मिट्टी स्वस्थ रहेगी तो उत्पादन टिकाऊ रहेगा और प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित रहेंगे तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। इसलिए सतत कृषि, जल संरक्षण, मिट्टी स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल को सीएसआर के केंद्र में रखना समय की मांग है। यह केवल पर्यावरण की चिंता नहीं है; यह आने वाली पीढ़ियों की खाद्य और आर्थिक सुरक्षा का सवाल भी है। सीएसआर की सबसे बड़ी ताकत साझेदारी हो सकती है। कॉरपोरेट संस्थाओं के पास संसाधन और प्रबंधन क्षमता है, विश्वविद्यालयों के पास ज्ञान और शोध क्षमता, सरकार के पास व्यापक तंत्र और ग्रामीण समुदायों के पास स्थानीय अनुभव। यदि ये चारों एक साथ काम करें तो सीएसआर का प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है। आईपीएल फाउंडेशन द्वारा शैक्षणिक और कृषि संस्थानों के साथ सहयोग की दिशा इसलिए महत्वपूर्ण है। ऐसे मॉडल को केवल एक कंपनी की पहल न मानकर व्यापक सीएसआर व्यवस्था के लिए उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए।
आईपीएल फाउंडेशन की गतिविधियों ने सीएसआर के क्षेत्र में एक सकारात्मक दिशा जरूर दिखाई है, लेकिन असली परीक्षा आगे है। किसी भी पहल की सफलता इस बात से तय होगी कि वह कितने समय तक चलती है और उसके परिणाम कितने स्थायी होते हैं। सीएसआर को कार्यक्रमों की संख्या से नहीं, बदलाव की गुणवत्ता से मापा जाना चाहिए। यदि एक किसान कम पानी में अधिक उत्पादन हासिल करता है, एक विद्यार्थी को कृषि क्षेत्र में नया अवसर मिलता है, एक गांव अपनी स्थानीय समस्या का स्थायी समाधान खोज लेता है या किसी परिवार को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिलती है तो यही सीएसआर की वास्तविक सफलता है। भारत आज विकसित अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में कॉरपोरेट क्षेत्र की भूमिका केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं रह सकती। उसे सामाजिक और पर्यावरणीय विकास में भी भागीदार बनना होगा। आईपीएल फाउंडेशन की हाल की पहलों को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। कृषि से लेकर शिक्षा तक और किसान से लेकर युवा तक, सीएसआर को समाज के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने का माध्यम बनाया जा सकता है। आखिरकार, सीएसआर का अंतिम उद्देश्य केवल यह बताना नहीं होना चाहिए कि कंपनी ने समाज के लिए क्या किया, बल्कि यह होना चाहिए कि समाज में क्या बदला। यदि यह सोच मजबूत होती है, तो सीएसआर खर्च नहीं रहेगा, वह सामाजिक निवेश बन जाएगा। और यही वह सोच है, जिसके जरिए आईपीएल फाउंडेशन सामाजिक सरोकारों के क्षेत्र में एक नई इबारत लिखने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

