रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच एक बार फिर दुनिया की नजर रूस के खतरनाक लड़ाकू विमान MiG-31 पर टिक गई है। यह वही विमान है जिसे रूस ने कभी भारत को बेचने की कोशिश की थी। लंबी दूरी से दुश्मन के विमान मार गिराने की क्षमता, हाइपरसोनिक मिसाइल लॉन्च करने की ताकत और “सैटेलाइट किलर” जैसी पहचान के बावजूद भारतीय वायुसेना (IAF) ने इसे अपने बेड़े में शामिल नहीं किया।
अब सवाल यह है कि आखिर इतना ताकतवर विमान भारत ने क्यों ठुकरा दिया?
रूस-यूक्रेन युद्ध में फिर चर्चा में आया MiG-31
रूस इस समय यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में MiG-31 इंटरसेप्टर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहा है। यह विमान लंबी दूरी की R-37M एयर-टू-एयर मिसाइल से लैस है, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर से दुश्मन के विमान को निशाना बना सकती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक यूक्रेनी लड़ाकू विमान MiG-31 की स्पीड, ऊंचाई और रडार क्षमता के सामने कमजोर साबित हुए हैं। यही वजह है कि यह विमान रूस के लिए “आसमान का शिकारी” बन गया है।
MiG-31 से रूस Kinzhal हाइपरसोनिक मिसाइल भी लॉन्च करता है, जिसे रोकना बेहद मुश्किल माना जाता है। यूक्रेन ने कई बार इन विमानों को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन यह प्लेटफॉर्म अब भी रूस की सबसे बड़ी हवाई ताकतों में गिना जाता है।
आखिर कितना खतरनाक है MiG-31?
सोवियत दौर में विकसित MiG-31 को खास तौर पर लंबी दूरी के इंटरसेप्शन मिशन के लिए बनाया गया था। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी रफ्तार और रडार सिस्टम है।
MiG-31BM वेरिएंट का Zaslon-M रडार लगभग 400 किलोमीटर दूर तक बड़े एयरबोर्न टारगेट पकड़ सकता है। यह एक साथ 24 टारगेट ट्रैक कर सकता है और 8 पर हमला करने की क्षमता रखता है।
विमान Mach 2.8 तक की रफ्तार पकड़ सकता है और इसके साथ लगने वाली R-37M मिसाइल Mach 6 की स्पीड से हमला कर सकती है। यही कारण है कि इसे दुनिया के सबसे खतरनाक इंटरसेप्टर विमानों में गिना जाता है।
भारत ने टेस्ट भी किया, फिर क्यों नहीं खरीदा?
पूर्व एयर मार्शल अनिल चोपड़ा ने 1999 में रूस के सोकोल एयरक्राफ्ट प्लांट में MiG-31 उड़ाया था। उन्होंने बताया कि टेकऑफ के कुछ ही मिनटों में विमान ने बेहद तेज गति पकड़ ली और लगभग 15 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच गया।
इसके बावजूद भारत ने इस विमान को खरीदने से इनकार कर दिया।
IAF को क्यों नहीं पसंद आया MiG-31?
विशेषज्ञों के मुताबिक MiG-31 की सबसे बड़ी कमजोरी यही थी कि यह एक “स्पेशलाइज्ड इंटरसेप्टर” था। यानी यह केवल हाई-स्पीड इंटरसेप्शन और लंबी दूरी के मिशन के लिए बेहतर था, लेकिन आधुनिक मल्टीरोल युद्ध के लिए नहीं।
उस समय भारत ऐसी फाइटर जेट क्षमता चाहता था जो एक साथ कई भूमिकाएं निभा सके—एयर डिफेंस, ग्राउंड अटैक, समुद्री ऑपरेशन और लंबी दूरी की स्ट्राइक। यही वजह थी कि भारत ने Sukhoi Su-30MKI को प्राथमिकता दी।
Su-30MKI ज्यादा बहुउद्देश्यीय, आधुनिक और भारतीय जरूरतों के हिसाब से बेहतर साबित हुआ।
रखरखाव और लागत भी बनी बड़ी वजह
MiG-31 का रखरखाव बेहद महंगा और जटिल माना जाता है। भारत पहले ही MiG-25 जैसे रूसी विमानों के ऑपरेशन में भारी तकनीकी चुनौतियों का सामना कर चुका था।
अगर भारत सीमित संख्या में MiG-31 खरीदता, तो उसके लिए अलग लॉजिस्टिक सिस्टम, ट्रेनिंग और सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना पड़ता। इससे लागत बढ़ती लेकिन रणनीतिक फायदा सीमित रहता।
‘सैटेलाइट किलर’ क्षमता भी नहीं बदल सकी फैसला
रूस ने भारत को यह कहकर आकर्षित करने की कोशिश की थी कि MiG-31 भविष्य में एंटी-सैटेलाइट हथियार ले जाने में सक्षम हो सकता है। लेकिन भारत ने विदेशी प्लेटफॉर्म पर निर्भर होने के बजाय अपनी स्वदेशी एंटी-सैटेलाइट क्षमता विकसित करने का रास्ता चुना।
भारत ने बाद में Mission Shakti के जरिए खुद अपनी ASAT क्षमता का प्रदर्शन किया।
ताकतवर जरूर, लेकिन भारत की रणनीति अलग थी
MiG-31 आज भी दुनिया के सबसे तेज ऑपरेशनल लड़ाकू विमानों में शामिल है। रूस और कजाखस्तान अब भी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन भारतीय वायुसेना ने केवल ताकत नहीं, बल्कि लंबी अवधि की रणनीति, मल्टीरोल क्षमता और टिकाऊ संचालन को प्राथमिकता दी।
यही कारण है कि “सैटेलाइट किलर” कहलाने वाला यह रूसी विमान भारत के आसमान का हिस्सा नहीं बन पाया।

