
‘M’ फैक्टर ने कैसे बंगाल का भविष्य तय किया
मुस्लिम फैक्टर
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 30% मुस्लिम आबादी वह ‘M’ फैक्टर है, जो किसी भी दल को सत्ता के शिखर पर पहुंचा सकता है। पारंपरिक तौर पर यह टीएमसी का पक्का वोट बैंक रहा है। लेकिन इस चुनाव में टीएमसी के इस वोट बैंक पर दोहरी मार पड़ी। पहला झटका हुमायूं कबीर ने दिया, जिन्होंने अपनी नई आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के जरिए मुस्लिम वोटों में बड़ी सेंध लगाई। रही-सही कसर बीजेपी की आक्रामक ध्रुवीकरण की राजनीति ने पूरी कर दी, जिसने इस ‘M’ फैक्टर के इर्द-गिर्द एकदम नए और चौंकाने वाले सियासी समीकरण गढ़ दिए।
महिला वोटर्स
बंगाल की सियासत में इस बार महिलाओं ने ही ‘किंगमेकर’ की कमान संभाल ली है। टीएमसी के लिए ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाएं महिलाओं को लुभाने का सबसे बड़ा ट्रंप कार्ड रहीं। लेकिन बीजेपी ने भी इस मोर्चे पर कड़ी घेराबंदी की। मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के अलावा, बीजेपी का सीधा वार महिला सुरक्षा के मुद्दे पर था। संदेशखाली की घटना हो या आरजी कर का खौफनाक कांड—बीजेपी ने इन्हें महिला सम्मान का ज्वलंत मुद्दा बनाकर ममता सरकार के खिलाफ एक मजबूत नैरेटिव सेट कर दिया। इसी आधी आबादी को अपने पाले में करने की इस होड़ ने बंगाल के पूरे चुनावी समीकरण को बदलकर रख दिया है।
माइग्रेंट
इस बार बंगाल चुनाव में हार-जीत की एक बड़ी चाबी उन लाखों प्रवासी मज़दूरों के हाथ में भी रही, जो अक्सर चुनाव के दिन अपने घरों से दूर रहते हैं। रोज़गार के अभाव में पलायन कर चुके इन युवाओं और उनके परिवारों ने इस बार वोट डालने के लिए जिस तरह बंगाल का रुख किया, उसने सारे समीकरण बदल दिए। इसका असर इतना व्यापक था कि दिल्ली-एनसीआर और ख़ासकर नोएडा की रिहायशी सोसाइटियों में बंगाली कामगारों के छुट्टी पर जाने से कामकाज ठप पड़ गया। मज़दूरों की यह वापसी चुनाव में एक बड़ा नैरेटिव बन गई। वोट की इस अहमियत को समझते हुए बीजेपी ने इन प्रवासियों को ‘सोनार बांग्ला’ का विज़न दिखाकर राज्य में ही रोज़गार देने का वादा किया। इसके विपरीत, ममता सरकार ने आक्रामक रुख अपनाते हुए मज़दूरों की इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर मोदी सरकार की नीतियों और वित्तीय असहयोग को ज़िम्मेदार ठहराया।
मतुआ
उत्तर 24 परगना और उसके सीमावर्ती इलाकों में सत्ता का रास्ता सीधे मतुआ समुदाय के दरवाज़े से होकर गुज़रता है। नागरिकता कानून (CAA) की मांग इस समुदाय की सबसे बड़ी धुरी है, जिसके इर्द-गिर्द बीजेपी की पूरी राजनीति घूमती है। इस बार भी बीजेपी का पूरा ज़ोर सीएए के ज़रिए अपने इस पारंपरिक और निर्णायक वोट बैंक को एकजुट रखने पर रहा। लेकिन टीएमसी ने इस बार पूरी बिसात बदल दी। सीएए के राष्ट्रीय मुद्दे को कमज़ोर करने के लिए टीएमसी ने बहुत सधी हुई चाल चली और ‘लोकल मुद्दों’ के साथ-साथ ज़मीनी स्तर पर जनता के भरोसे को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। इसी स्थानीय रणनीति ने मतुआ बहुल इलाकों की चुनावी लड़ाई को बेहद दिलचस्प बना दिया है।
मोदी फैक्टर
बंगाल फतह के लिए बीजेपी का सबसे बड़ा हथियार ‘मोदी फैक्टर’ ही साबित हुआ। पीएम मोदी की रैलियों का आक्रामक रुख, केंद्रीय योजनाओं का रिपोर्ट कार्ड और राष्ट्रीय विमर्श ने पूरी पार्टी को नए जोश से भर दिया। मोदी की व्यापक स्वीकार्यता ने नए वोटर्स को बड़ी तादाद में पार्टी से जोड़ा। ज़मीन पर जनता से सीधे कनेक्ट होने की पीएम की इस कला का एक यादगार पल झाड़ग्राम में सामने आया। जब अपने मेगा रोडशो के बीच पीएम मोदी एक आम बंगाली की तरह सड़क किनारे ‘झालमुड़ी’ का लुत्फ़ उठाते दिखे, तो इस दृश्य ने साबित कर दिया कि चुनाव जीतने के लिए महज़ वादे नहीं, बल्कि जनता के साथ ज़मीनी और सांस्कृतिक जुड़ाव भी उतना ही ज़रूरी है।

