HomeNational Newsक्या सोनम वांगचुक अब सरकार के साथ खड़े हो गये हैं?

क्या सोनम वांगचुक अब सरकार के साथ खड़े हो गये हैं?


यह संतोष का विषय है कि काकरोच जनता पार्टी और केंद्र सरकार के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया है। विट्ठल हाऊस में संपन्न वार्ता में काकरोच जनता पार्टी ने सरकार के समक्ष अपनी तीन मांगों को दोहराया जिन पर वह अभी तक जोर देती आई है। वार्ता के बाद काकरोच जनता पार्टी की ओर से यह बताया गया कि नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले अभ्यर्थियों के परिवारों को मुआवजा तथा प्रदर्शनकारी छात्रों के विरुद्ध दर्ज मामले वापस लेने‌ की मांगों पर सहमति बनने की संभावना है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर काकरोच जनता पार्टी अडिग है। सरकार ने काकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों को शनिवार को फिर से बातचीत के लिए बुलाया है। एक बात तो तय प्रतीत होती है कि काकरोच जनता पार्टी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग छोडने के लिए तैयार नहीं होगी। बैठक के बाद काकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों ने जो बयान दिया है उससे तो यही अनुमान लगाया जा सकता है।

गौरतलब है कि इसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक के दोषियों के विरुद्ध जल्द सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन तथा पेपर लीक रोकने के लिए संसद में विधेयक पेश किए जाने की जो घोषणाएं की थीं उससे सरकार और आंदोलन कारी छात्रों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू करने के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में मदद मिली है। पर्यावरणविद सोनम वांगचुक के अनशन की समाप्ति के बाद उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करके प्रधानमंत्री ने सरकार के सकारात्मक रुख के संकेत दिए हैं। दूसरी ओर संसद में इस मुद्दे पर विपक्ष और सरकार के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के बाद ही वह सदन में इस मुद्दे पर चर्चा में भाग लेने के लिए तैयार होगी। सवाल यह उठता है कि जब काकरोच जनता पार्टी और कांग्रेस की एक जैसी मांगें हैं तो सरकार छात्रों का आंदोलन समाप्त कराने के लिए इन दोनों में से केवल काकरोच जनता पार्टी के साथ ही बातचीत का सिलसिला शुरू करने में क्यों दिलचस्पी ले रही है। जाहिर सी बात है कि सरकार इस मुद्दे पर संसद में चर्चा में कांग्रेस को भाग लेने के लिए तो आमंत्रित कर रही है लेकिन कांग्रेस को बातचीत की टेबिल पर नहीं बुलाना चाहती। यह शायद तब संभव हो सकता था जबकि राहुल गाँधी अथवा कांग्रेस के कोई दिग्गज नेता जंतर मंतर के मंच पर पहुँच कर छात्र आंदोलन को समर्थन देते। राहुल गाँधी यह तो कह रहे हैं कि वे छात्रों के साथ मजबूती से खड़े हैं परंतु वे जंतर मंतर के मंच पर अपनी मौजूदगी नहीं दिखाना चाहते।
गौरतलब है कि सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद सोनम वांगचुक ने नीट पेपर लीक से जुड़े मामले में अपनी कुछ विशिष्ट मांगों के साथ जंतर मंतर पर गत 28 जून को जो अनिश्चित कालीन अनशन हड़ताल शुरू किया था उसे उन्होंने कल रात गुरुग्राम स्थित मेदांता हास्पिटल में केंद्रीय मंत्री द्वय जे पी नड्डा और जितेन्द्र सिंह के हाथों से चाय पीकर तोड़ दिया। गौरतलब है कि सरकार द्वारा पहले उन्हें जंतरमंतर से न ई दिल्ली के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था लेकिन बाद में उनकी पत्नी गीतांजलि आगमों की याचिका पर फैसला देते हुए हाईकोर्ट ने उन्हें मेदांता हास्पिटल में शिफ्ट करने का आदेश दिया था। यूँ तो सोनम वांगचुक से अनशन तोड़ने के लिए जंतर मंतर पर भी अनेकों बार अनुरोध किया गया था और उन्हें अस्पताल में भर्ती किए जाने के बाद भी यह सिलसिला निरंतर जारी रहा परंतु उन्होंने सरकार की ओर से यह भरोसा दिलाए जाने के बाद अपना अनशन समाप्त किया कि वह संसद में पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में जवाब देही तय करने के मुद्दे पर संसद में चर्चा कराने, शांतिपूर्ण प्रदर्शन कारियों के विरुद्ध कोई कानूनी कार्रवाई न करने तथा नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले परीक्षार्थियों के परिवारों को मुआवजे देने के बारे में सकारात्मक विचार करेगी ।

सोनम वांगचुक ने यह भी बताया कि उनके लिए अहम बात छात्रों के विरुद्ध कार्रवाई रुकवाना अहम बात थी इसलिए उन्होंने शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे पर जोर नहीं दिया ।जेपी नड्डा और जितेन्द्र सिंह की मौजूदगी में सोनम वांगचुक ने जिस समय अपना अनशन समाप्त किया उसके थोड़ी ही देर बाद प्रधानमंत्री मोदी ने पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोनम वांगचुक के अनशन की समाप्ति पर खुशी जाहिर करते हुए यह घोषणा कर दी है कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान नीट पेपर लीक मामले में अपनी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए अपने पद से इस्तीफा नहीं दे देते तब तक जंतर मंतर पर छात्रों का प्रदर्शन जारी रहेगा।तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने एक्स पर लिखा कि हम आपका सम्मान करते हैं।हमें ये खुशी है कि आपने अनशन तोड़ दिया। कृपया आराम करें और अपनी सेहत का ख्याल रखें और यह सुनिश्चित करें कि सरकार आपकी आवाज का इस्तेमाल आंदोलन तोड़ने के लिए न करे। इसके साथ ही महुआ मोइत्रा ने यह भी कहा कि आप्टिक्स नाम की भी कोई चीज़ होती है। अनशन तोडना ही था तो किसी और के हाथ से तोड़ लेते। गौरतलब है कि 22 जुलाई को विपक्षी सांसदों के एक प्रतिनिधिमण्डल ने भी मेदांता अस्पताल जाकर सोनम वांगचुक को एक पत्र सौंप कर उनसे अनशन समाप्त करने का अनुरोध किया था। इस पत्र पर विपक्ष के 65 सांसदों के हस्ताक्षर थे।

विपक्षी सांसदों के पत्र में सोनम वांगचुक को वैसा ही भरोसा दिलाया गया था जैसा भरोसा उन्हें सरकार की ओर से जेपी नड्डा और जितेन्द्र सिंह ने 23 जुलाई की रात को मेदांता अस्पताल में दिलाया था। विपक्षी सांसदों के प्रतिनिधि मंडल में आम आदमी पार्टी के संजय सिंह, कांग्रेस के विवेक तंखा, तृणमूल कांग्रेस की सागरिका घोष सहित अन्य विपक्षी दलों के सांसद शामिल थे। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त होने से सभी ने राहत की सांस ली है लेकिन केंद्रीय मंत्री द्वय जेपी नड्डा और जितेन्द्र प्रसाद के अनुरोध पर उन्हीं दोनों के हाथों से चाय ग्रहण कर अनशन तोड़ने के उनके फैसले ने उनके उन शुभचिन्तकों को खिन्न कर दिया है जो विगत 26 दिनों से उनसे अपना अनशन समाप्त करने का अनुरोध कर रहे थे।


नीट पेपर लीक मामले में केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर मंतर पर लगभग 35 दिनों से छात्रों का जो धरना चल रहा है उसने केंद्र की एनडीए सरकार को इतना झकझोर दिया है कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी छात्रों के आक्रोश को शांत करने के लिए व्यक्तिगत रूप से अपनी चिंता व्यक्त करने में कोई संकोच नहीं कर रहे हैं। दरअसल 20 जुलाई को आंदोलनकारी छात्रों के संसद मार्च के दौरान उन पर केवल पुलिस,रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों ही नहीं बल्कि सादी वर्दी में दिखाई देने वाले लोगों ने कथित रूप से जो बर्बरता दिखाई उसने सरकार की कार्रवाई पर इतने सवाल खड़े कर दिए कि सरकार के लिए जवाब देना मुश्किल हो गया। इस मार्च में शामिल छात्राओं और महिलाओं के प्रति नृशंसता से पेश आने के जो आरोप लगे उन्हें झुठलाने अथवा उसके बचाव में सरकार की ओर से जो भी तर्क दिए गए वे भी काम नहीं आए। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने छात्रों के संसद मार्च के दौरान ही काकरोच जनता पार्टी के दो नेताओं को अपने निवास पर बुलवा कर उनसे एक ज्ञापन ले लिया जिसमें काकरोच जनता पार्टी की तीन मांगें शामिल थीं परंतु केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद जेपी नड्डा उन पर सरकार की ओर से तत्काल कोई स्पष्ट आश्वासन देने की स्थिति में नहीं थे लिहाजा उन्होंने बैठक में केवल इतना आश्वासन दिया कि वे इन मांगों को उस स्तर तक पहुंचा देंगे जहां इन पर सरकार कोई फैसला कर सकती है।

काकरोच जनता पार्टी ने बाद में यह आरोप लगाया कि उनके प्रतिनिधियों से भेंट करने के लिए जेपी नड्डा ने पांच घंटे तक प्रतीक्षा करवाई जिसके पीछे संभवतः उनकी यह मंशा थी कि उतनी देर वे मार्च में शामिल होने से वंचित रह जाएं। संसद मार्च के दूसरे दिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस के 100 से अधिक वरिष्ठ नेताओं ने नाटकीय ढंग से पीएम आवास के बिल्कुल पास पहुंचकर जो धरना दिया उसने सरकार को भी सकते में ला दिया। धरना स्थल पर मौजूद प्रियंका गाँधी वाड्रा एवं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव यादव समेत सभी प्रदर्शन कारियों को पुलिस बलपूर्वक गिरफ्तार बसों में भरकर ले गई और लगभग डेढ़ घंटे तक हिरासत में रखने के बाद उन्हें छोड़ दिया। इन नेताओं की गिरफ्तारी के पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने राहुल गाँधी से बात की थी परंतु राहुल गाँधी जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े रहे तो बात बिगड़ गई।
दरअसल केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग ही सारे विवाद की जड़ है जिसके कारण सरकार और काकरोच जनता पार्टी के बीच एक माह से गतिरोध बना हुआ है। दूसरी ओर कांग्रेस भी इस मांग से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। पर्यावरण विद सोनम वांगचुक ने भी जब जंतर मंतर पर अनशन शुरू किया था तब उनकी भी सबसे प्रमुख मांग यही थी। केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर टस से मस न होने वाली कांग्रेस ने तो दो टूक कह दिया है कि संसद में नीट पेपर लीक मामले पर बहस में भाग लेने के लिए वह इसी शर्त पर तैयार होगी कि पहले केंद्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा दें लेकिन केंद्र सरकार की ओर से अभी तक जितने भी मंत्रियों के बयान आए हैं उनसे यही प्रतिध्वनित होता है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा तो किसी भी सूरत में नहीं लिया जाएगा। सरकार का मानना है कि धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफे के लिए कहने से विपक्ष और आंदोलनकारी छात्र इसे अपनी जीत के रूप में देखेंगे और आगे भी वे अपनी मांगे ं मनवाने के लिए यही रास्ता अख्तियार करेंगे।

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