मुंबई। जीवन की राह में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो केवल मंजिल तक पहुंचने का रास्ता नहीं दिखाते, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व को भी गढ़ते हैं। गुरु पूर्णिमा ऐसा ही अवसर है, जब हर व्यक्ति उन लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है, जिन्होंने उसे सही दिशा, सही सोच और आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया। गुरु केवल कक्षा में पढ़ाने वाले शिक्षक ही नहीं होते, बल्कि माता-पिता, कोच, वरिष्ठ, मार्गदर्शक और जीवन के हर उस व्यक्ति का रूप होते हैं, जिनसे हमें कोई महत्वपूर्ण सीख मिली हो।
इसी भाव को आत्मसात करते हुए सोनी सब के लोकप्रिय कलाकार छवि पांडे, देविश आहूजा, तोरल रसपुत्रा, मुस्कान बामने और समरिद्ध बावा ने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर अपने जीवन के उन खास लोगों को याद किया, जिन्होंने उनके व्यक्तिगत और पेशेवर सफर को नई दिशा दी। इन कलाकारों ने बताया कि कैसे छोटी-छोटी सीख, सकारात्मक मार्गदर्शन और विश्वास ने उन्हें बेहतर इंसान और बेहतर कलाकार बनने में मदद की।
मां से बड़ा कोई गुरु नहीं: छवि पांडे
‘यादें’ में डॉ. प्रीति देशमुख की भूमिका निभा रहीं छवि पांडे के लिए अभिनय की बारीकियां सीखने में उनके निर्देशक हमेशा मार्गदर्शक रहे हैं। किसी भी भावनात्मक दृश्य की तैयारी के दौरान वे आज भी अपने निर्देशक से सलाह लेना पसंद करती हैं। उनका मानना है कि अभिनय लगातार सीखने की प्रक्रिया है।
हालांकि, जब सबसे बड़े गुरु की बात आती है तो छवि बिना किसी झिझक के अपनी मां का नाम लेती हैं। उनके अनुसार, मां जीवन की पहली और सबसे महत्वपूर्ण गुरु होती हैं, जिनकी सीख हर परिस्थिति में साथ रहती है।
हर नया प्रोजेक्ट लेकर आता है नया गुरु: देविश आहूजा
‘यादें’ में डॉ. रौनक भाटिया का किरदार निभा रहे देविश आहूजा का मानना है कि उनके जीवन के पहले गुरु उनके माता-पिता हैं, जिन्होंने उनके व्यक्तित्व की मजबूत नींव रखी।
देविश कहते हैं कि अभिनय की दुनिया में हर नया प्रोजेक्ट उन्हें एक नया गुरु देता है। उन्होंने अपने वरिष्ठ कलाकारों और निर्देशकों से सकारात्मक सोच, अनुशासन, उदारता और टीम भावना जैसी कई अहम बातें सीखी हैं। उनका विश्वास है कि हर व्यक्ति से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है और यही सीख आगे बढ़ने का सबसे बड़ा माध्यम है।
सीखना कभी बंद नहीं होना चाहिए: तोरल रसपुत्रा
‘हस्तिनापुर के वीर’ में कुंती की भूमिका निभा रहीं तोरल रसपुत्रा किसी एक व्यक्ति को अपना गुरु नहीं मानतीं। उनके अनुसार, हर निर्देशक, हर वरिष्ठ कलाकार और हर अनुभव ने उनके अभिनय को नई ऊंचाइयां दी हैं।
तोरल का मानना है कि कलाकार की सबसे बड़ी ताकत उसकी सीखने की इच्छा होती है। वे कहती हैं कि सम्मान और विनम्रता किसी भी कलाकार की सबसे बड़ी पूंजी है। यही कारण है कि आज वे युवा कलाकारों का उसी तरह उत्साह बढ़ाने का प्रयास करती हैं, जैसा उन्हें अपने शुरुआती दिनों में मिला था।
विश्वास और सहयोग सबसे बड़ी सीख: मुस्कान बामने
‘पुष्पा इम्पॉसिबल’ में शनाया का किरदार निभा रहीं मुस्कान बामने अपने माता-पिता को अपना सबसे बड़ा गुरु मानती हैं। उनके अनुसार, अभिनय की शुरुआत में वे हर दृश्य से पहले घबरा जाती थीं, लेकिन सेट पर वरिष्ठ कलाकारों और निर्देशकों ने हमेशा उन्हें सहज महसूस कराया।
एक वरिष्ठ निर्देशक के शब्द—”रिलैक्स, हम सब यहां एक-दूसरे की मदद के लिए हैं”—आज भी उनके लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। मुस्कान कहती हैं कि अब जब वे किसी नए कलाकार को घबराया हुआ देखती हैं, तो उसे वही आत्मविश्वास देने की कोशिश करती हैं, जो उन्हें कभी मिला था।
मार्गदर्शन लेना कमजोरी नहीं, ताकत है: समरिद्ध बावा
‘पुष्पा इम्पॉसिबल’ में अश्विन की भूमिका निभा रहे समरिद्ध बावा का मानना है कि अनुभव हमेशा सम्मान के योग्य होता है। वे सेट पर वरिष्ठ कलाकारों और निर्देशकों से सवाल पूछने में कभी संकोच नहीं करते।
समरिद्ध बताते हैं कि उनके स्पोर्ट्स कोच ने उन्हें सिखाया था कि मार्गदर्शन लेना कमजोरी नहीं बल्कि सफलता की पहली सीढ़ी है। यही सीख आज भी उनके पेशेवर जीवन का आधार बनी हुई है। वे नए कलाकारों को भी गलतियों से डरने के बजाय उनसे सीखने की सलाह देते हैं।
गुरु केवल व्यक्ति नहीं, जीवन की प्रेरणा हैं
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सोनी सब के इन कलाकारों की बातें यह संदेश देती हैं कि सफलता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन, निरंतर सीखने की इच्छा और विनम्रता से मिलती है। चाहे वह माता-पिता हों, शिक्षक, निर्देशक, कोच या कोई वरिष्ठ सहयोगी—हर गुरु जीवन में एक नई दिशा और नया आत्मविश्वास देता है।
गुरु पूर्णिमा का यही संदेश है कि ज्ञान, संस्कार और अनुभव बांटने वाले हर व्यक्ति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की जाए, क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों के पीछे कहीं न कहीं किसी गुरु की प्रेरणा अवश्य होती है।

