नई दिल्ली। दुनिया लंबे समय से एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को देखती आई है, जहां शक्ति ही कई बार नियम तय करती रही है। जिसके पास आर्थिक ताकत अधिक है, जिसके पास सैन्य शक्ति अधिक है या जिसके पास वैश्विक संस्थाओं में प्रभाव अधिक है, उसकी आवाज को अपेक्षाकृत अधिक महत्व मिलता रहा है। लेकिन बदलती दुनिया में अब इस व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के दूसरे सत्र में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसी बदलती वैश्विक व्यवस्था की ओर संकेत करते हुए कहा कि “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाला दौर खत्म होना चाहिए। उनका संदेश था कि दुनिया के नियम किसी एक ताकतवर देश की इच्छा से नहीं, बल्कि सभी देशों की सहभागिता से तय होने चाहिए।
यह विचार केवल BRICS के लिए नहीं, बल्कि पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
दुनिया किसी एक शक्ति की जागीर नहीं
आज दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य विकासशील क्षेत्रों की आर्थिक तथा राजनीतिक भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में कुछ चुनिंदा शक्तियों का वर्चस्व लंबे समय तक कायम रहना स्वाभाविक रूप से कठिन है।
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इसी संदर्भ में कहा कि अंतरराष्ट्रीय नियम सभी देशों को मिलकर बनाने चाहिए। इसका मूल अर्थ यही है कि वैश्विक व्यवस्था में समानता, सहभागिता और संप्रभुता को केंद्रीय स्थान मिलना चाहिए।
यदि कोई नियम पूरी दुनिया के लिए है तो उसके निर्माण में पूरी दुनिया की भागीदारी भी होनी चाहिए।
ताकत का मतलब मनमानी का अधिकार नहीं
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सैन्य और आर्थिक शक्ति का महत्व अपनी जगह है। लेकिन शक्ति का अर्थ यह नहीं हो सकता कि ताकतवर देश अपनी सुविधा के अनुसार नियम बनाए और कमजोर देशों से उनका पालन करवाए।
‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली मानसिकता ने दुनिया को कई संघर्ष दिए हैं। जब शक्तिशाली देश अपने हितों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय नियमों की व्याख्या करते हैं, तो इससे वैश्विक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होता है।
इसीलिए अब आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जिसमें शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हो।
सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन सबसे ताकतवर है। सवाल यह होना चाहिए कि कौन वैश्विक शांति, स्थिरता और मानव कल्याण में सबसे जिम्मेदार भूमिका निभा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय कानून सबके लिए समान होना चाहिए
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने विकासशील देशों के बीच आपसी संबंधों को लेकर भी महत्वपूर्ण बात रखी। उन्होंने देशों से एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और विवादों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने के सिद्धांत का पालन करने की बात कही।
यह सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संबंधों की बुनियादी आवश्यकता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून यदि वास्तव में अंतरराष्ट्रीय है, तो उसका अनुपालन भी बिना भेदभाव और बिना दोहरे मानदंड के होना चाहिए। किसी देश के लिए एक नियम और दूसरे देश के लिए दूसरा नियम वैश्विक व्यवस्था में विश्वास को कमजोर करता है।
यही दोहरे मानदंड आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं।
भारत के लिए भी यह बहस महत्वपूर्ण
नई दिल्ली में आयोजित BRICS सम्मेलन का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि भारत लंबे समय से बहुध्रुवीय और अधिक प्रतिनिधित्व वाली वैश्विक व्यवस्था की वकालत करता रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी सम्मेलन में वैश्विक शासन में ‘पिरामिड ऑफ प्रिविलेज’ को ‘प्लेटफॉर्म ऑफ पार्टनरशिप’ में बदलने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
अर्थात भारत और चीन की भाषा भले ही अलग-अलग संदर्भों में सामने आई हो, लेकिन दोनों वक्तव्यों में एक महत्वपूर्ण समानता दिखाई देती है—वैश्विक व्यवस्था में अधिक व्यापक भागीदारी की आवश्यकता।
हालांकि, किसी भी देश के वक्तव्य की वास्तविक कसौटी उसके शब्द नहीं, बल्कि उसका व्यवहार होता है। समानता और संप्रभुता की बात तभी प्रभावी होगी जब इन्हें व्यवहार में भी समान रूप से स्वीकार किया जाए।
BRICS के सामने बड़ी जिम्मेदारी
BRICS का विस्तार वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलाव का संकेत है। यदि यह समूह केवल आर्थिक सहयोग का मंच न रहकर वैश्विक शासन सुधार का प्रभावी मंच बनता है, तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव संभव है।
लेकिन इसके लिए सदस्य देशों को भी अपने भीतर पारदर्शिता, परस्पर सम्मान और संप्रभु समानता के सिद्धांतों को मजबूत करना होगा।
BRICS की ताकत इस बात में नहीं होगी कि वह किसी दूसरे शक्ति-समूह का मुकाबला करे। उसकी असली ताकत तब होगी जब वह दुनिया के सामने सहयोग, संवाद और समानता पर आधारित वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था का मॉडल प्रस्तुत करे।
अब ताकत नहीं, तर्क और साझेदारी हो आधार
दुनिया बदल रही है। आर्थिक शक्ति का केंद्र बदल रहा है, तकनीक शक्ति का नया आधार बन रही है और विकासशील देशों की आवाज पहले की तुलना में अधिक मुखर हो रही है।
ऐसे दौर में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को केवल सैन्य शक्ति के चश्मे से देखना पुरानी सोच होगी।
‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का सिद्धांत यदि कभी अंतरराष्ट्रीय राजनीति की कठोर वास्तविकता रहा भी हो, तो अब दुनिया को उससे आगे बढ़ना होगा।
लाठी की जगह कानून, मनमानी की जगह संवाद, वर्चस्व की जगह साझेदारी और दोहरे मानदंडों की जगह समान नियम—यही 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था की दिशा होनी चाहिए।
आखिर दुनिया किसी एक देश की नहीं है। संकट साझा हैं, चुनौतियां साझा हैं और भविष्य भी साझा है। इसलिए वैश्विक नियम बनाने का अधिकार भी साझा होना चाहिए।
शक्ति महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन शक्ति से ऊपर न्याय, समानता और अंतरराष्ट्रीय कानून का शासन होना चाहिए। यही वह व्यवस्था है जो दुनिया को स्थायी शांति और स्थिरता की ओर ले जा सकती है।

