HomeState News#ReservationHataoAandolan पर तेज़ हुई बहस, आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की उठी मांग

#ReservationHataoAandolan पर तेज़ हुई बहस, आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की उठी मांग

75 वर्षों बाद आरक्षण के प्रभाव और वास्तविक लाभार्थियों पर राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श की जरूरत बताई गई

नई दिल्ली। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर #ReservationHataoAandolan तेज़ी से चर्चा का विषय बना हुआ है। दावा किया जा रहा है कि महज़ तीन दिनों में इस अभियान से 57 लाख (5.7 मिलियन) से अधिक लोग जुड़े, जिसके बाद आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस की मांग तेज़ हो गई है।

अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि आरक्षण का मूल उद्देश्य उन सामाजिक वर्गों को अवसर प्रदान करना था, जो ऐतिहासिक रूप से वंचित और पिछड़े रहे हैं। उनका मत है कि स्वतंत्रता के लगभग 75 वर्ष बाद यह समीक्षा की जानी चाहिए कि आरक्षण का लाभ वास्तव में सबसे गरीब और जरूरतमंद लोगों तक कितना पहुंचा है तथा कितने परिवार लगातार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसका लाभ उठाते रहे हैं।

संसद में व्यापक चर्चा की मांग

अभियान से जुड़े लोगों ने मांग की है कि संसद में तथ्यात्मक और गंभीर चर्चा हो कि क्या वर्तमान आरक्षण व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर रही है। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए व्यवस्था की समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि वास्तविक रूप से वंचित लोगों को अधिक प्रभावी सहायता मिल सके।

भूमिहार समाज की आर्थिक स्थिति का भी उठाया गया मुद्दा

अभियान के समर्थकों ने बिहार सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि उसमें भूमिहार समाज को सवर्ण वर्ग का आर्थिक रूप से सबसे कमजोर समुदाय बताया गया है। ऐसे में इस समाज के गरीब परिवारों के लिए भी विशेष अवसरों और प्रभावी सहायता अथवा आरक्षण जैसी व्यवस्थाओं पर विचार करने की मांग की गई है।

EWS आरक्षण को लेकर भी उठे सवाल

कुछ लोगों द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण को पर्याप्त बताए जाने पर अभियान के समर्थकों का कहना है कि इसका लाभ मुख्य रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित है तथा प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया भी अनेक गरीब परिवारों के लिए चुनौतीपूर्ण होती है।

EBC को मिलने वाली सुविधाओं का दिया गया उदाहरण

अभियान में बिहार के अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) को मिलने वाली विभिन्न सरकारी सुविधाओं का भी उल्लेख किया गया। इनमें सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण, छात्रवृत्तियां, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए विशेष सहायता, छात्रावास सुविधाएं, कौशल विकास योजनाएं तथा पंचायत एवं नगर निकायों में 20 प्रतिशत आरक्षण जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। दावा किया गया कि बिहार में स्थानीय निकायों के लगभग 28 से 30 हजार निर्वाचित पद EBC वर्ग के लिए आरक्षित हैं।

ग्रामीण युवाओं की आर्थिक चुनौतियों का जिक्र

अभियान में यह भी कहा गया कि अनेक ग्रामीण युवा आज रोजगार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और सूरत जैसे शहरों में सुरक्षा गार्ड, चालक, ऑटो चालक, पेट्रोल पंप कर्मचारी, राजमिस्त्री, मजदूर अथवा छोटे व्यवसायों में कार्य करने को मजबूर हैं। इसे आर्थिक असमानता और सीमित अवसरों का संकेत बताया गया।

संवैधानिक अधिकारों का सम्मान, निष्पक्ष समीक्षा की मांग

अभियान से जुड़े लोगों ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी वर्ग को प्राप्त संवैधानिक अधिकारों का विरोध नहीं करते। उनकी मांग केवल इतनी है कि आर्थिक रूप से कमजोर सभी समुदायों की निष्पक्ष समीक्षा की जाए और जिन वर्गों की आर्थिक स्थिति वास्तव में कमजोर हो चुकी है, उन्हें भी समान अवसर और प्रभावी सहायता उपलब्ध कराई जाए।

उन्होंने कहा कि आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय का समाधान केवल संवाद, तथ्यों और संविधान के मूल्यों के आधार पर ही संभव है।

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