धार: मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर वर्षों से चल रहे विवाद पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने भोजशाला को ‘वाग्देवी मंदिर’ मानते हुए हिंदू पक्ष को वहां पूजा-अर्चना का अधिकार दिया है। वहीं मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए अलग जमीन उपलब्ध कराने के निर्देश राज्य सरकार को दिए गए हैं। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि भोजशाला परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में ही रहेगा।
यह मामला लंबे समय से विवाद और कानूनी लड़ाई का केंद्र बना हुआ था। पांच याचिकाओं और तीन हस्तक्षेप आवेदनों पर विस्तृत सुनवाई के बाद दो सदस्यीय खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस स्थल पर हिंदू पूजा की परंपरा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी, इसलिए इसे केवल विवादित ढांचा मानना उचित नहीं होगा।
फैसले के बाद प्रशासन पूरी तरह सतर्क हो गया है, क्योंकि भोजशाला परिसर में शुक्रवार को जुमे की नमाज भी अदा की जाती रही है। सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है और स्थानीय प्रशासन को शांति बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं।
राजा भोज से जुड़ा है भोजशाला का इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध शासक राजा भोज ने करीब 1034 ईस्वी में कराया था। राजा भोज को विद्या, साहित्य और कला का बड़ा संरक्षक माना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने यहां संस्कृत शिक्षा के लिए एक विशाल शिक्षण केंद्र स्थापित कराया था, जिसे बाद में ‘भोजशाला’ के नाम से जाना गया।
यह स्थान मां सरस्वती को समर्पित माना जाता है और इसे “सरस्वती कंठाभरण महाविद्यालय” के रूप में भी पहचान मिली। धार जिले की आधिकारिक ऐतिहासिक जानकारी में भी इस स्थल को विद्या और संस्कृति के प्रमुख केंद्र के रूप में उल्लेखित किया गया है।
ASI सर्वे में मिले धार्मिक अवशेष
भोजशाला विवाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट को बेहद महत्वपूर्ण माना गया। वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान परिसर से 94 प्राचीन मूर्तियां और अवशेष मिलने का दावा किया गया। इनमें भगवान गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह और भैरव जैसी आकृतियां स्पष्ट रूप से दिखाई देने की बात कही गई।
रिपोर्ट में कई स्थापत्य चिन्ह और नक्काशियां भी सामने आईं, जिन्हें हिंदू मंदिर शैली से जुड़ा बताया गया। इन्हीं तथ्यों और ऐतिहासिक साक्ष्यों को अदालत ने अपने फैसले में अहम आधार माना।

