Friday, April 17, 2026
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प्रधानमंत्री आवास के पास की झुग्गियों पर हटाने की कार्रवाई तेज, 717 परिवारों को नोटिस

राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के आसपास बनी तीन झुग्गी बस्तियों को हटाने की प्रक्रिया तेज हो गई है। केंद्र सरकार की ओर से इन बस्तियों में रहने वाले 717 परिवारों को 6 मार्च 2026 तक जगह खाली करने का नोटिस दिया गया है। नोटिस में कहा गया है कि निर्धारित समय तक मकान खाली न करने पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

कौन सी जगह?

जानकारी के मुताबिक ये बस्तियां भाई राम कैंप, मस्जिद कैंप और DID कैंप के नाम से जानी जाती हैं। ये इलाके 7 लोक कल्याण मार्ग (पूर्व में रेस कोर्स रोड) के पास स्थित हैं। वर्ष 2016 में न्यू दिल्ली म्यूनिसिपल काउंसिल ने रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग कर दिया था, हालांकि भूमि अभिलेखों में अभी भी पुराने नाम का उल्लेख मिलता है।यह कार्रवाई आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अधीन आने वाले लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस (L&DO) द्वारा की जा रही है।

19 फरवरी 2026 को जारी एक नोटिस में कहा गया कि संबंधित झुग्गी क्लस्टर सरकारी जमीन पर बने हैं।सरकार के अनुसार जनवरी 2024 में L&DO और दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) ने संयुक्त सर्वे किया था। सर्वे के आधार पर पात्र निवासियों को पुनर्वास योजना के तहत दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (DUSIB) की सावदा घेवरा कॉलोनी में फ्लैट आवंटित करने का निर्णय लिया गया। सावदा घेवरा दिल्ली के बाहरी इलाके में स्थित है और मुख्य शहर से लगभग 45 किलोमीटर दूर बताया जाता है।

इससे पहले 29 अक्टूबर 2025 को भी निवासियों को पुनर्वास संबंधी नोटिस जारी किया गया था। हालांकि इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। 13 नवंबर 2025 को अदालत ने सरकार से जवाब तलब किया और अंतरिम आदेश में कहा कि बिना उचित प्रक्रिया के निवासियों को बेदखल नहीं किया जाएगा। बाद में जनवरी 2026 में सरकार ने जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा। मामले की अगली सुनवाई 13 मई को निर्धारित है और तब तक अंतरिम आदेश प्रभावी रहेगा।स्थानीय निवासियों का कहना है कि दूरस्थ स्थान पर पुनर्वास से उनके रोजगार, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो सकती है।

वहीं, अधिकारियों का तर्क है कि शहर के सुव्यवस्थित विकास और भूमि प्रबंधन के लिए यह कदम आवश्यक है।दिल्ली में झुग्गी पुनर्वास का मुद्दा लंबे समय से विवादों में रहा है और ऐसे मामलों में अक्सर न्यायालय का हस्तक्षेप देखने को मिलता है। फिलहाल सभी की नजरें अदालत की अगली सुनवाई और प्रशासन की आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं।

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