यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पीएम मोदी का 400 पार वाला नारा सफल होगा या नहीं! क्योंकि वर्तमान में अगर बात अन्य पार्टियों की कीजाए तो वह सभी एक है और पीएम मोदी एक तरीके से अकेले लड़ रहे हैं! तो सवाल यह की क्या यह नारा अब सफल हो पाएगा? आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पिछले महीने भाजपा ने मोदी के चेहरे की बढ़त के साथ ‘राम मंदिर’, ‘ताकतवर होता भारत’ और ‘मोदी की गारंटी’ के दम पर प्रचार अभियान को आगे बढ़ाया। पार्टी ने इसी मकसद को 2014 में ‘अच्छे दिन’ और 2019 में ‘बालाकोट एयर स्ट्राइक’ जैसे मुद्दों के जरिए साधा था। इन सभी तरकीबों ने काफी लोकप्रियता हासिल की है, लेकिन इससे कोई व्यापक विमर्श खड़ा नहीं हो पाया। ये मुद्दे अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में बदलते रहे। इससे पता चलता है कि बीजेपी ने कांग्रेस के घोषणा पत्र में शामिल एजेंडे पर पूरा फोकस नहीं रखा। इस कारण, राज्यों में चुनावी खींचतान का रुख राष्ट्रीय मिजाज से अपेक्षाकृत अलग रहा है। चुनावी पिच राज्य स्तरीय मुद्दों, जाति-समुदाय की चिंताओं और निर्वाचन क्षेत्र आधारित विमर्शों से अधिक परिभाषित होती है। हालांकि, जरूरी नहीं कि बेरोजगारी, महंगाई जैसे विपक्षी दलों के मुद्दों पर लड़ा जा रहा है बल्कि यह बहुत कुछ राज्य विशेष के मुद्दों और उनके जाति-समुदाय के समीकरणों पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, किसान संकट और मराठा कोटा आंदोलन मराठवाड़ा में विपक्षी एमवीए को सूट करते हैं तो कानून-व्यवस्था की अपील पश्चिमी यूपी में सपा के सामाजिक न्याय के मुद्दे को कुंद करती है जिससे बीजेपी बमबम है। ‘अबकी बार, 400 पार’ के नारे ने हिंदी पट्टी के दलितों को उहापोह में डाल दिया है, लेकिन इससे सवर्णों और पिछड़ी जातियों का जोश हाई हो गया है। एनडीए बिहार और आंध्र प्रदेश में तो दृढ़ता से आगे बढ़ रहा है, लेकिन कर्नाटक और महाराष्ट्र में अस्थिरता का अहसास हो रहा है। ऐसे में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि ‘क्षेत्रीय’ या ‘स्थानीय रूप से’ तैयार चुनावी मैदान में विरोधी टीम कम से कम प्रतिस्पर्धा के स्तर पर पहुंच जाती है।
दूसरी बात यह है कि पूर्वी और दक्षिणी भारत के बड़े हिस्से को छोड़कर भाजपा का दबदबा अभी भी सीमित है। इसलिए उस पर कुछ प्रमुख राज्यों में समर्थन खोने का क्या खतरा मंडराता रहता है। इसलिए बीजेपी को फिर से एकतरफा बहुमत हासिल करना है तो उसे दबदबे वाले इन राज्यों में अपना प्रदर्शन दोहराने की सख्त जरूरत होगी। आपको बता दे की तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के कम जनाधार का मतलब है कि इन सभी राज्यों में अगर वोट शेयर में जबर्दस्त वृद्धि हो भी गई तो भी उसे एकाध सीटें ही हासिल होने की संभावना बनेगी। 2014 से पहले बीजेपी ने अधिकतम 182 लोकसभा सीटें जीतने का रिकॉर्ड बनाया था। इसके साथ ही उसने बहुमत का आंकड़ा तभी पार किया जब मोदी लहर का जादू चल सका।
फिर भी, भाजपा का सपोर्ट बेस काफी मजबूत है। पिछली बार इसने 43% सीटों पर बहुमत हासिल किया था, इसलिए अगर उसके कुछ वोट कम भी गए तो सीटों के मामले में कोई नुकसान शायद ही हो। जैसा कि राजनीतिक वैज्ञानिक फिलिप ओल्डेनबर्ग ने बताया है, 90 के दशक के बाद भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव हुए जिसके असर से चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर एकतरफा लहर बनने के चलन का अंत हो गया। क्षेत्रीय दलों के उभार ने राज्य स्तर पर राष्ट्रीय विमर्शों की धार कुंद कर दी और प्रादेशिक मुद्दों को आवाज मिलने लगी। ऊपर से जातीय अस्मिता की लड़ाई को भी चुनावों का आधार बना दिया गया। ऐसा तीन दशकों तक चला, लेकिन 2014 में लगातार दो बाप मोदी लहर ने इतिहास की धारा को पलट दिया और राष्ट्रीय राजनीति को फिर से केंद्र में ला दिया। हालांकि, आज भी राष्ट्रीय स्तर पर छा जाने योग्य कोई मुद्दा गढ़ पाना लोहे के चने चबाने जैसा है।
इसके अलावा, एनडीए का लगातार दो हार से त्रस्त विपक्ष से मुकाबला है। पिछले कुछ हफ्तों में अलायंस को-ऑर्डिनेशन और विपक्षी इंडी गठबंधन अपने प्रचार अभियानों में सावधानियां बरतने लगा है। जिन इलाकों में कांग्रेस कमजोर है, वह वहां से अपने पैर पीछे खींचने लगी है। उम्मीद है कि वह इतिहास में सबसे कम सीटों अंतिम नामांकन के बाद लगभग 330 पर चुनाव लड़ेगी। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में गांधी परिवार की अगुवाई वाली कुछ रैलियों को छोड़कर कांग्रेस ने सपा के नेतृत्व वाले ‘पिछड़े जाति’ केंद्रित अभियान के लिए लगभग पूरा मैदान खुला छोड़ दिया है।
हालांकि भाजपा अभी भी साफतौर पर मतदाताओं की पसंद बनी हुई है, लेकिन इस बार का चुनाव लहर के बजाय ‘सामान्य’ प्रतिस्पर्धी राजनीति की ओर झुका दिख रहा है। यह भी सही है कि इसे राज्य/क्षेत्र और जाति/समुदाय के विभिन्न गुरुत्वाकर्षण बल अपनी ओर खींचने में लगे हैं।

