किसी राज्य का नाम बदलना सिर्फ एक औपचारिक घोषणा भर नहीं होता, बल्कि यह एक लंबी और खर्चीली प्रशासनिक प्रक्रिया होती है। हाल ही में केंद्र सरकार ने केरल का नाम आधिकारिक रूप से ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इसके बाद यह सवाल फिर चर्चा में है कि आखिर किसी राज्य का नाम बदलने में कितना खर्च आता है।
कितना हो सकता है खर्च?
पूर्व अनुभवों के आधार पर अनुमान है कि किसी राज्य या बड़े शहर का नाम बदलने में करीब 200 करोड़ से 500 करोड़ रुपये तक का खर्च आ सकता है। यह राशि राज्य के आकार, आबादी और प्रशासनिक ढांचे पर निर्भर करती है।
खर्च किन-किन कामों में होता है?
1. साइन बोर्ड और सार्वजनिक संकेतक बदलनाराज्य के नाम में बदलाव होने पर हाईवे बोर्ड, सड़क संकेतक, रेलवे स्टेशन नेम प्लेट, एयरपोर्ट साइनेज और सरकारी इमारतों पर लगे डिस्प्ले बोर्ड बदलने पड़ते हैं।उदाहरण के तौर पर, जब मुंबई का नाम पहले बॉम्बे से बदला गया था, तब भारतीय रेल को सिर्फ साइन बोर्ड और टिकट संशोधन पर ही करोड़ों रुपये खर्च करने पड़े थे।
2. सरकारी रिकॉर्ड और स्टेशनरी अपडेटराज्य सरकार के सभी विभागों को लेटरहेड, आधिकारिक मुहर, पहचान पत्र, कार्यालय बोर्ड और कानूनी दस्तावेजों में बदलाव करना होता है। इसके अलावा पुराने अभिलेख (आर्काइव्ड फाइलें) भी अपडेट करनी पड़ती हैं। यह काम हजारों सरकारी दफ्तरों में एक साथ होता है।
3. डिजिटल सिस्टम में बदलावसरकारी पोर्टल, भूमि अभिलेख, डिजिटल मानचित्र, डाक विभाग का डेटाबेस, टैक्स प्लेटफॉर्म और कानूनी रजिस्ट्रियां—सभी में नया नाम दर्ज करना पड़ता है। डिजिटल ढांचे के विस्तार के कारण यह हिस्सा अब पहले से ज्यादा खर्चीला हो गया है।
4. निजी क्षेत्र पर असरराज्य में पंजीकृत कंपनियों, बैंकों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य व्यवसायों को भी अपने दस्तावेज, ब्रांडिंग सामग्री, पैकेजिंग और पते में बदलाव करना पड़ता है। इससे निजी क्षेत्र पर भी आर्थिक बोझ पड़ता है।ऐसा ही एक उदाहरण तब सामने आया था जब प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) का नाम बदला गया। उस समय प्रशासनिक और ढांचागत बदलावों पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च होने की बात कही गई थी।
क्या है प्रक्रिया?
भारत में किसी राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत होती है।पहले राज्य विधानसभा प्रस्ताव पारित करती है।इसके बाद प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाता है।गृह मंत्रालय विभिन्न विभागों से राय लेता है।राष्ट्रपति की सिफारिश के बाद संसद में विधेयक पेश होता है।
दोनों सदनों से साधारण बहुमत से पारित होने पर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलती है।मंजूरी के बाद नया नाम आधिकारिक रूप से लागू हो जाता है।कुल मिलाकर, किसी राज्य का नाम बदलना राजनीतिक और सांस्कृतिक निर्णय तो होता ही है, साथ ही यह आर्थिक रूप से भी एक बड़ा और जटिल कदम साबित होता है।

